अनियोजित विकास का जोशीमठ
अनियोजित विकास का जोशीमठ
हिमालय में दिनोंदिन बढ़ रही आपदाओं का जिम्मेदार मानवीय दखल और अनियंत्रित विकास है। मानवीय गतिविधियों में बेतहासा वृद्धि के कारण हिमालय का जल चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है। राज्य के 45 प्रतिशत झरने, नौले-धारे, छोटी नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं। 21 प्रतिशत नदियां, नौले-धारे मौसमी यानी बरसाती हो गये हैं।
नीरज जोशी
पिछले एक महीने से अधिक समय से जोशीमठ के जगह-जगह से दरकने पर मचा शोर अभी थमा नहीं है। ढेर सारी लानत-मलानत के बाद अब बचने-बचाने के त्वरित समाधान तलाशे जा रहे हैं। हालांकि जोशीमठ की धरती का फटना अभी भी रुका नहीं है, दरारें आये दिन खाई की तरह बढ़ती जा रही हैं। कहते हैं दरकना और भूस्खलन होना पहाड़ों की नियति है, ऐसे कितने दर्जन जोशीमठ अकेले उत्तराखंड हिमालय की गोद में छुपे हैं यह सभी को मालूम है। उनको भी जो करोड़ों की आबादी को पहाड़ों का सीना छलनी कर हिमालय के उत्तुंग शिखरों तक पहुंचाने पर आमादा हैं और उन्हें भी जो नदियों को कई किलोमीटर लम्बी सुरंगों में फंसा कर कार्बन क्रेडिट जुटाने के लिए पनबिजली परियोजनाएं लगा रहे हैं। इसलिए इस बात को ज्यादा तवज्जो नहींं दी जा रही है कि जोशीमठ किस बबार्दी तक पहुंचेगा। जोशीमठ में दरारें पिछले कई वर्ष से आ रही थीं। एकाध साल से तो मीडिया में भी इस तरह की खबरें नमूदार हो रही थीं लेकिन शासन तब तक नहींं माना जब तक लोगों के घर नहीं दरके और स्थिति नियंत्रण से बाहर होती नहीं दिखी। हमारे शासकों और नीति नियंताओं का हिमालय की इस बेतरतीब और जानलेवा टूटफूट को लेकर इतना निरपेक्ष हो जाना इस बात का भी प्रमाण है कि हमने उत्तराखंड व अन्य हिमालय के राज्यों में आने वाली आपदा को उसका स्वभाव मान लिया है। जोशीमठ की धरती भले ही दरक रही हो, लोगों के आसियाने, खेत-खलिहान और बसासत भले ही दांव पर लग चुकी हो लेकिन वहां अभी तक जानमाल का नुकसान नहीं हुआ है। हमारा तंत्र इस नुकसान का आदी हो चुका है। अभी कुछ साल पहले ही केदारनाथ की वह भयावह आपदा आई थी जैसी हिमालय के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं आई जो हजारों लोग और हजारों मवेशी लील गई थी। इसके अलावा भी उत्तराखंड ने पिछले दो-तीन दशक में इतनी भयावह और मारक त्रासदियां देखी हैं कि जोशीमठ की बबार्दी उनके सामने कहीं नजर नहीं आती। केदारनाथ आपदा के समय सरकार का फौरी अनुमान था कि इस आपदा में जानमाल के अतिरिक्त तेरह हजार करोड़ की क्षति हुई। अक्टूबर 1991 में आये उत्तरकाशी भूकंप ने 650 लोगों की जिंदगी लील ली थी। जोशीमठ अभी इनके सामने कहीं नहीं टिकता।
जैसा कि जोशीमठ के अपने पहले दौरे में ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने माना कि आपदाएं उनके राज्य की नियति बन गई हैं। उन्होंने उत्तरकाशी भूकंप, मालपा से लेकर केदारनाथ आपदा आदि को गिनाते हुए कहा कि अपनी विशिष्ट भौगोलिक संरचना के कारण राज्य को प्रतिवर्ष कई प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने इस बात पर संतोष जताया कि जोशीमठ में किसी तरह की जानमाल की क्षति अभी तक नहीं हुई है। पिछले तीन दशक से आपदाओं की बारंबारता हिमालय में बहुत तेजी से बढ़ी है। इसका कारण तेजी से कटते जंगल (एक अध्ययन बताता है 1981 से 1911 के दौरान राज्य में 6 प्रतिशत वन नष्ट हो गये हैं), दिनों दिन बढ़ रहा अवांछित मानवीय हस्तक्षेप, अनियोजित और बेतरतीब शहरीकरण (अनुमान है कि 1981 तक राज्य में शहरी जनसंख्या 10 प्रतिशत थी जो अब बढ़कर 35 प्रतिशत हो गई है), पत्थरों और रेता-बजरी के लिए नदियों का खनन, बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण और धार्मिक पर्यटन के नाम पर बढ़ रहा जनसंख्या का भार है। इन आपदाओं में भूकम्प, भूस्खलन, अतिवृष्टि, बादल फटना, बाढ़, हिमस्खलन, तापमान वृद्धि के कारण ग्लेशियरों का पिघलना और जंगलों की आग आदि मुख्य हैं। 1998 में मालपा, बादल फटने या 1991 के उत्तरकाशी भूकंप भले ही प्राकृतिक आपदा रहे हों लेकिन इसका भी अप्रत्यक्ष कारण हिमालय में अवांछित मानवीय हस्तक्षेप रहा है। केदारनाथ आपदा के कारणों में प्रकृति से ज्यादा मानवीय भूलें और लापरवाही मानी गई। जून 2013 की केदारनाथ तबाही के बाद भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में प्रस्तावित और निर्माणाधीन 24 बड़ी और महत्वाकांक्षी जलविद्युत परियोजनाओं को हमेशा के लिए बंद कर दिया। एक अनुमान के अनुसार 2013 से पहले गंगा और इसकी सहायक नदियों अलकनंदा, मंदाकिनी, पिंडर, भागीरथी, काली, धौली, सरयू और रामगंगा पर 505 बांध और 244 पनबिजली परियोजनाएं प्रस्तावित, निर्माणाधीन और कुछ बन चुकी थी। स्पष्ट है हिमालय में दिनोंदिन बढ़ रही आपदाओं का जिम्मेदार मानवीय दखल और अनियंत्रित विकास है। मानवीय गतिविधियों में बेतहासा वृद्धि के कारण हिमालय का जल चक्र पूरी तरह बिगड़ चुका है। राज्य के 45 प्रतिशत झरने, नौले-धारे, छोटी नदियां पूरी तरह सूख चुकी हैं। 21 प्रतिशत नदियां, नौले-धारे मौसमी यानी बरसाती हो गये हैं। वनों के अंधाधुंध कटान के कारण इनके बहाव में 1981 से 2011 तक तीस बरस में 15 प्रतिशत की कमी आ गई है। जल प्रवाह तंत्र में दखल के कारण भूस्खलन और बाढ़ में 20 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
उत्तराखंड के किसी भी शहर में भूस्खलन या भूकंप जैसी कोई आपदा आने के बाद कहने को तत्काल शहर में होने वाले निर्माण प्रतिबंधित कर दिये जाते हैं लेकिन इसके बाद कोई ऐसा तंत्र नहीं जो इन प्रतिबंधों पर नजर रखे। इसलिए आये दिन विस्तार पाते हुए उत्तराखंड के कस्बे और शहर 20 वर्ष में चार गुना हो गये हैं। अकेले कुमांऊ में ग्रामीण इलाकों से भारी पलायन के बावजूद शहरों की आबादी पिछले 30 साल में कहीं-कहीं छह गुना तक बढ़ी है। जहां तीन दशक पहले 1.2 वर्ग किमी में शहर होता था वहां अब 6 वर्ग किमी में मकान हो गये हैं। नैनीताल जनपद का भीमताल ऐसा ही कस्बा है जो तीन दशक में छह गुना फैल गया है। इस अनियंत्रित और अनियोजित विकास का कोई जिम्मेदार नहीं है। यही हाल अल्मोड़ा, हल्द्वानी, नैनीताल, रामनगर, पिथौरागढ़ का भी है। कहते हैं नैनीताल अपनी भार वहन क्षमता पूरी कर चुका है। कहने को यहां निर्माण पर रोक है लेकिन यह सब आपदा के समय ही होता है। जोशीमठ इस परंपरा का अपवाद नहीं है। कभी जीवन की अंतिम यात्रा के पड़ाव माने जाने वाले उत्तराखंड के तीर्थ और मठ अब किस तरह बेइंतहा आबादी और तमाशाई टूरिज्म के हब बना दिये गये हैं उसका उदाहरण केदारनाथ मंदिर परिसर, रामबाणा बाजार, गौरीकुंड, सोनप्रयाग, सीतापुर, सेमी कुंड, काकड़ागाड़, बांसबाड़ा, स्यालचौड़, चन्द्रापुरी, गांगापुरी, गावनीगांव, पुराना देवल, अगस्त्यमुनि, सिल्ली, सुमाड़ी और तिलवाड़ा पेश कर चुके हैं। मंदाकिनी घाटी में भी सैकड़ों गांव तो बदरीनाथ, हेमकुड साहिब, पांडुकेश्वर, गोविन्दघाट, घांघरिया, श्रीनगर, हर्षिल, भटवाड़ी, धनोल्टी, नैनबाग, मुनस्यारी, धारचूला, मदकोट, बलुवाकोट में भी 13 जून 2013 को भयावह जल प्रलय आया था। कहते हैं जून की उमस भरी गर्मी से राहत पाने यहां हजारों सैलानी आये थे जो सैलाब में समा गये। सरकारी अनुमान चार हजार लोगों के मरने का है लेकिन शव 600 ही मिले बाद में लापता लोगों को मृत घोषित कर उनके परिजनों को मुआवजा दे दिया गया। स्पष्ट है दुर्गम पहाड़ों में भारी-भरकम सुविधाएं मिलने के बाद महानगरों की आबादी इन तीर्थों में तफरी करने, रील बनाने और अय्यासी के लिए जा रही है जो हिमालय के सनातन स्वभाव पर गहरी चोट है।

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