धामी ने मोदी के सम्मुख रखी राज्य की समस्याएं
राज्य के सामने 24 का चुनावी समर हो या आत्मनिर्भर उत्तराखंड@25 जैसे महात्वाकांक्षी लक्ष्य, इनको हासिल कर लेना इतना आसान काम नहीं है। हालांकि इस तरह के लक्ष्य नवंबर 2021 में ही पुष्कर सिंह धामी की पहली पारी के दौरान आगामी चुनाव को देखते हुए तय कर दिये गये थे जिन पर मार्च 2022 में उनकी दूसरी बार ताजपोशी के बाद अमल होना आरंभ हुआ।
नीरज जोशी
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत 31 जुलाई को राज्य के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से की गई मुलाकात और इस दौरान उनके द्वारा प्रधानमंत्री के सामने रखी गयी उत्तराखंड की मांगों के जखीरे की तारीफ करते नहीं थक रहे हैं। उनका मानना है कि डबल इंजन की सरकार में राज्यों के नेता इस तरह अपने राज्य की बुनियादी और बहुत जरूरी मांगों को आलाकमान के सामने रखने का साहस नहीं जुटा पाते जैसा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जुटाया है। हालांकि वे इनमें से कई महत्वपूर्ण मांगों को अपने कार्यकाल के समय की बताते हुए उन्हें भाजपानीत सरकार द्वारा ठंडे बस्ते में डाल दिये जाने और अब अपना बनाकर 24 के रण का ब्रह्मास्त्र बनाने का आरोप भले ही मढ़ रहे हों लेकिन अपने नेतृत्व के सामने राज्य की इन महत्वपूर्ण मांगों को रखने के लिए वे धामी की खुले दिल से सराहना भी कर रहे हैं। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की 31 जुलाई की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हुई मुलाकात और उनके द्वारा उत्तराखंड की तमाम मांगों को उनके सामने रखने और प्रधानमंत्री की ओर से मिले सकारात्मक आश्वासन के बाद पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोशल मीडिया में पोस्ट डालकर इसका जिक्र किया। हालांकि देहरादून मैट्रो जिसे अब नियो मैट्रो का नाम दिया गया है और भीमताल-मोरनौला-लोहाघाट-पंचेश्वर रोड और टनकपुर-पिथौरागढ़ रोडों को लेकर उनका कहना है कि ये मांगें और इन पर काम 2016 में हो रहा था जिसे उसके बाद की भाजपा सरकार ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था जिसे अब मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार के सामने रख रहे हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत से परे राज्य की समस्याओं और उनके सामाधान के प्रति मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की गंभीरता को देखा जाये तो पहली बार उनकी मांगों को देखकर लगा कि वे राज्य की चिंताओं और समस्याओं के प्रति गंभीर हैं और अपने तई भले ही वे इनके समाधान में सक्षम न हों पर वे केन्द्र के सहयोग से इनका समाधान कर सकते हैं। मसलन देहरादून नियो मैट्रो रेल परियोजना हो या सौंग बांध परियोजना जिन्हें वे देहरादून के भविष्य के लिए अपरिहार्य मानते हैं। सच में ही ओल्ड दिल्ली की तरह अपनी सीमाओं और विस्तार को खत्म कर सिमट चुके देहरादून शहर के यातायात के लिए मैट्रो और दिनोंदिन बेतरतीब पसरती आबादी के लिए पीने का पानी भविष्य में बड़ी समस्या बनेगा। सौंग बांध और नियो मैट्रो देहरादून के लिए अपरिहार्य तो हैं लेकिन इनको सहजता से केन्द्र से निकलवा लेने के लिए डबल इंजन सरकार की मजबूरी के बजाय राज्य के नेतृत्व की मजबूती और राज्य हित में समर्पण जरूरी है। कोई संदेह नहीं है कि उत्तराखंड में आल वैदर रोड से लेकर चारधाम और तमाम राष्ट्रीय राजमार्ग और अन्य परियोजनाएं और केदारनाथ पुनर्निमाण सब काम केन्द्र या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उत्तराखंड प्रेम के चलते ही हो रहे हैं। पिछले छह वर्षों में शायद ही राज्य ने किसी बड़ी मांग के लिए केन्द्र पर दबाव बनाया हो।
राज्य के सामने 24 का चुनावी समर हो या आत्मनिर्भर उत्तराखंड@25 जैसे महात्वाकांक्षी लक्ष्य, इनको हासिल कर लेना इतना आसान काम नहीं है। हालांकि इस तरह के लक्ष्य नवंबर 2021 में ही पुष्कर सिंह धामी की पहली पारी के दौरान आगामी चुनाव को देखते हुए तय कर दिये गये थे जिन पर मार्च 2022 में उनकी दूसरी बार ताजपोशी के बाद अमल होना आरंभ हुआ। आत्मनिर्भर उत्तराखंड@25 के स्लोगन को चंपावत से मुख्यमंत्री का चुनाव जीतने के बाद इस लक्ष्य को चंपावत की ओर भले ही मोड़ दिया गया हो लेकिन परिकल्पना, सिद्धातों, सेमिनार और वर्कशाप के परे जमीनी स्तर पर पिछले डेढ़ साल में ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है जिससे आत्मनिर्भर उत्तराखंड@25 जैसा कोई सपना पूरा होता नजर आ रहा हो। इस बात में कोई संदेह नहीं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और उनके चिंतकों ने उत्तराखंड की अतीत की सरकारों की विफलता और उर्जा एवं बड़ी परियोजनाओं पर आधारित उनके विकास मांडल को फेल होते और केदारनाथ आपदा के बाद इस ओर आगे बढ़ने के रास्ते बंद होने के बाद जिस राह को चुना है वह त्वरित परिणाम देने वाली नहीं है। छोटे उद्योग, छोटी परियोजनाएं, प्राकृतिक उत्पाद और आध्यात्मिक पर्यटन के साथ जैविक खेती सहित जितने भी अवदान हैं वे समय की दरकार रखते हैं।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद राज्य की रीढ़ ऊर्जा और पर्यटन को बनाया गया। पनबिजली परियोजनाओं से 25000 मेगावाट बिजली उत्पादन और उसे बेचने के लक्ष्य तय किये गये थे। पर्यटन तो अभी भी राज्य को आपदाओं के साथ कुछ राजस्व दे भी रहा है लेकिन पनबिजली बेचने का सपना पूरी तरह तबाह हो गया। कभी 25000 मेगावाट बिजली उत्पादन कर बेहिसाब धन कमाने के सपने देखने वाला राज्य वर्तमान में हिमाचल से 1250 मेगावाट बिजली खरीद रहा है। केदारनाथ आपदा के बाद जिस तरह उच्चतम न्यायालय ने उत्तराखंड की दर्जनों पनबिजली परियोजनाओं को रद्द किया है उसके बाद और हाल की विष्णुगाड़ तपोवन जैसी आपदाओं के बाद इस ओर सोचने से भी नीति नियंता डरने लगे हैं। ऐसे में राज्य की समृद्धि के स्रोत क्या हों। खनन और शराब के इतर उत्तराखंड की सरकार के पास ऐसे कोई बड़े स्रोत नहीं हैं जिससे राज्य अपने संसाधनों से विकास को गति दे सके। ऐसे में 2007 से 2012 के बीच की भाजपा सरकार में पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक की तरह ग्रीन बोनस जैसी मांग पर जोर दिया जा सकता है। हालांकि उस समय केन्द्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी इसके बावजूद वे कुछ मात्रा में राज्य के लिए केन्द्र से ग्रीन बोनस जुटाने में कामयाब रहे।
हाल की प्रधानमंत्री मोदी जी के साथ हुई मुलाकात में जिस तरह राज्य की बहुत जरूरी मांगों को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने रखा है उन पर कितना अमल हो पाता है यह बात तो और है क्योंकि स्वयं वे प्रधानमंत्री से इस बात की शिकायत कर चुके हैं कि केन्द्रीय सड़क अवसंरचना निधि से उन्हें 2500 करोड़ की मांग के सापेक्ष 250 करोड़ ही स्वीकृत हुए हैं। जिसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री से निवेदन भी किया है। पिछले छह साल में पहली बार जिस तरह पुष्कर सिंह धामी ने पहली बार राज्य की मांगों को बड़ी सिद्दत के साथ केन्द्र के सामने रखा है उससे यह आशा भी प्रबल होती है कि वे लगभग 70 प्रतिशत वन और साल भर इतने ही प्रतिशत आपदाओं से ग्रस्त राज्य के लिए ग्रीन बोनस पर अपनी ही सरकार के साथ सहमति बनाने का प्रयास करें। यदि इस मद में राज्य को पांच हजार करोड़ की धनराशि प्रतिवर्ष मिलती है तो राज्य अपने सतत विकास में कामयाब हो सकता है। इस तरह के ठोस प्रयास ही आत्मनिर्भर उत्तराखंड@25 जैसे लक्ष्यों को जमीनी स्तर तक ले जा सकते हैं।
पिछले डेढ़ साल में राज्य सरकार द्वारा जिस तरह के प्रयास इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए किये गये हैं वे इस तरह के लक्ष्यों को दीर्घकाल में हासिल करने के लिए नींव का काम कर सकते हैं लेकिन राज्य के 25 वर्ष पूरे होने पर राज्य पलायन के अभिशाप से मुक्त होकर आत्मनिर्भर हो जाय ऐसा संभव नहीं दीखता इसलिए इस तरह के लक्ष्यों का पुनर्निर्धारण भी गलत नहीं है।
महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी भी अपने राजनीतिक और तमाम दायित्वों से मुक्त होने के बाद आजकल आत्मनिर्भर उत्तराखंड का जुमला लेकर उत्तराखंड के दूरदराज इलाकों में घूम रहे हैं। 80 के पार पहुंचे कोश्यारी जी ने इसे शगल के रूप में लिया है। हालांकि इसके लिए उन्होंने कोई तिथि या समय निर्धारित नहीं किया है लेकिन राज्य की आत्मनिर्भरता की राह उन्हें भी उन छोटे उद्यमियों, काश्तकारों और किसानों के आसापास ही नजर आ रही है जो अपने परंपरागत आजीविका स्रोतों के उन्नयन में लगे हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि यह तुरत विकास की राह भले ही नहीं है लेकिन उत्तराखंड के सुरक्षित भविष्य की राह भी यही है। यमुना और टौंस घाटियों ने उत्तराखंड को बार-बार यह सिखाया है। जौनसार से लेकर पुरोला और नौगांव, बड़कोट और जौनपुर तक की समृद्ध कृषि और बागवानी भविष्य के आत्मनिर्भर उत्तराखंड को
ढांढस बंधाती है। ’
मुख्यमंत्री द्वारा बैठक में उठाये गये प्रमुख विषय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी की अध्यक्षता में नई दिल्ली में आयोजित नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की 8वीं बैठक में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने प्रतिभाग किया। मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड के विकास में मार्गदर्शन और सहयोग के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और केंद्र सरकार का आभार व्यक्त करते हुए राज्य से संबंधित विभिन्न प्रमुख विषयों को रखा। जैसे कि –
- ग्रीन बोनस : मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र में वनों, बुग्यालों, ग्लेशियरों का संरक्षण करके हम संपूर्ण राष्ट्र को महत्वपूर्ण पर्यावरणीय सेवायें उपलब्ध करा रहे हैं। आईआईएफएम, भोपाल के एक अध्ययन के अनुसार उत्तराखंड के वनों से प्राप्त होने वाली इन सेवाओं का न्यूनतम मौद्रिक मूल्य 95,000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष है। भविष्य में राज्यों के मध्य संसाधनों के आवंटन में इन वन एवं पारिस्थितिकी सेवाओं के मानक को बढ़ाने का उन्होंने अनुरोध किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब तक यह प्रणाली अस्तित्व में नहीं आती तब तक उत्तराखंड राज्य को ग्रीन बोनस प्रदान किया जाये।
- भ्रमणशील जनसंख्या : मुख्यमंत्री ने कहा कि सामान्यत: विभिन्न केन्द्र पोषित योजनाओं में स्थिर जनसंख्या के मानक का उपयोग किया जाता है। महत्वपूर्ण तीर्थ स्थानों विशेष तौर पर चारधाम तथा कांवड़ यात्रा में उत्तराखंड में बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों का वर्षभर आवागमन होता है, जो राज्य की जनसंख्या का पांच से छह गुना है। तीर्थयात्रियों एवं पर्यटकों को समस्त आधारभूत सुविधायें जैसे- पार्किंग, यातायात, पेयजल, स्वच्छता, आवास, परिवहन, जन सुरक्षा इत्यादि राज्य के सीमित संसाधनों से ही करनी होती है। उन्होंने वित्तीय संसाधनों के आवंटन एवं नीति निर्माण में इस महत्वपूर्ण तथ्य को सम्मिलित किये जाने का अनुरोध किया।
- बाह्य सहायतित परियोजनाएं : मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य की लगभग 19,000 करोड़ रुपए की 11 वाह्य सहायतित परियोजनाएं पाइप लाइन में हैं। इन परियोजना प्रस्तावों पर नीति आयोग, डी.ई.ए, संबन्धित केन्द्रीय मंत्रालयों से संस्तुति तथा फंडिंग एजेंसियों से सैद्धान्तिक सहमति प्राप्त हो चुकी है। राज्य के वित्तीय संसाधन बहुत सीमित हैं जिस कारण ई.ए.पी तथा सी.एस.एस. पर ही हमारी निर्भरता है। वित्त मंत्रालय के आदेश के अनुसार उत्तराखंड एवं हिमाचल प्रदेश हेतु इसमें सीलिंग लगायी गयी है। इन परियोजनाओं पर कटौती किये जाने से राज्य में अवस्थापना सुविधाओं के सृजन तथा आजीविका के अवसर बाधित हो जायेंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री जी से इसका समुचित समाधान करवाने का अनुरोध किया।
- ऊर्जा : राज्य में 25 मेगावाट से कम लघु एवं सूक्ष्म जल विद्युत परियोजनाओं की उत्पादन क्षमता लगभग 3500 मेगावाट है जबकि इसमें से मात्र 200 मेगावाट का ही दोहन हो रहा है। उन्होंने अनुरोध किया कि 25 मेगावाट से कम क्षमता की परियोजनाओं के अनुमोदन तथा क्रियान्वयन का अधिकार राज्य सरकार को प्रदान किया जाए।
- नदी जोड़ो परियोजना : मुख्यमंत्री ने कहा कि महत्वाकांक्षी नदी जोड़ो योजना के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा कुछ हिमनद नदियों को वर्षा आधारित नदियों से जोड़ने पर विचार किया जा रहा है। ऐसी अति महत्वपूर्ण नदी-जोड़ो परियोजना के क्रियान्वयन हेतु अत्यधिक धनराशि की जरूरत है, इसके लिये मुख्यमंत्री ने भारत सरकार से विशेष वित्तीय सहायता एवं तकनीकी सहयोग का अनुरोध किया।
- केन्द्र पोषित योजनाओं में लचीलापन: मुख्यमंत्री ने कहा कि केन्द्र पोषित अधिकांश योजनाएं वन साइज फिट आॅल के आधार पर बनती हैं। जो राज्यों की अपनी विशिष्ट परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं होती हैं, परन्तु राष्ट्रीय कृषि विकास योजना जैसी योजनायें भी हैं जिसकी गाइडलाइन में पर्याप्त लचीलापन है। इसके कारण राज्य की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार कार्य करने की स्वायत्तता रहती है। स्वायत्ता की यही प्रक्रिया अन्य केन्द्र पोषित योजनाओं के लिये भी अपनायी जानी चाहिये ताकि उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य केन्द्र पोषित योजनाओं का अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकें।
- औद्योगिक प्रोत्साहन नीति : मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में लागू औद्योगिक प्रोत्साहन नीति वर्ष 2017 के अंतर्गत प्राप्त प्रोत्साहन वर्ष 2022 में समाप्त हो चुके हैं, जबकि जम्मू कश्मीर तथा पूर्वोत्तर राज्यों हेतु इसी प्रकार की अन्य औद्योगिक नीति वर्तमान में भी चल रही है। पर्वतीय राज्य होने के कारण हमारी समस्यायें भी उन्हीं राज्यों की तरह ही हैं। उन्होंने औद्योगिक प्रोत्साहन नीति को उत्तराखंड राज्य में भी आगामी पांच वर्षों के लिये विस्तारित करने का अनुरोध किया।

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