Krishi Chaupal

आवश्यक है जैविक खेती

आवश्यक है जैविक खेती

Sep 13, 2023
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वर्ष 1960 के मध्य में पारंपरिक खेती तथा बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण पूरे देश में अकाल की स्थिति उत्पन्न होने लगी थी। उन परिस्थितियों में भारत ने विदेशों से संकर प्रजाति के बीजों का आयात किया। अपनी अधिक उत्पादन क्षमता के कारण इन बीजों को उच्च उत्पादकता किस्म कहा गया। सर्वप्रथम उच्च उत्पदकता बीज की किस्मों को वर्ष 1960-63 के दौरान देश के 7 राज्यों के 7 चयनित जिलों में प्रयोग किया गया और इसे गहन कृषि जिला कार्यक्रम का नाम दिया गया। यह प्रयोग सफल रहा तथा वर्ष 1966-67 में भारत में हरित क्रांति को औपचारिक तौर पर अपनाया गया जो कृषि खाद्यान्न उत्पादन के लिए वरदान साबित हुआ। इस दौरान पारंपरिक बीजों के स्थान पर उच्च उत्पादकता किस्मों के प्रयोग से सिंचाई के लिए अधिक पानी, उर्वरक, कीटनाशक, खरपतवारनाशक की आवश्यकता बढ़ने लगी तथा इन्हें बढ़ावा देने के लिए व इनकी आपूर्ति हेतु विभिन्न योजनाओं का विस्तार किया गया तथा अनुदान दिया जाना भी आरंभ किया गया। परंतु खाद्यान्न उत्पादन की होड़ में अत्यधिक रासायनिक खादों, जहरीले खरपतवारनाशकों, कीटनाशकों व फफूंदनाशकों के उपयोग से मानव स्वास्थ्य, भूमि एवं भू-जल को खतरा पैदा हो गया। इस कारण आज आम आदमी के साथ-साथ किसानों की जागरूकता ने जैविक उत्पादन एवं जैविक विधि से अधिक उत्पादन लेने के महत्व को समझा है। जैविक खेती प्राचीन भारतीय कृषि प्रणाली है और यह आधुनिक रसायन प्रधान युग में भी प्रासंगिक है।
पर्यावरण में स्वच्छता तथा प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने हेतु मृदा, जल और वायु को दूषित किए बिना भूमि को स्वस्थ एवं सक्रिय रखकर लंबे समय तक उत्पादन प्राप्त करने को ही जैविक कहा जाता है। इस पद्धति में उर्वरकों एवं रासायनिक पदार्थों का उपयोग प्रतिबंधित होता है। जैविक खेती में केवल जैव-रसायनों के उपयोग, वनस्पति व जैव-विविधता को बढ़ावा तथा कार्बनिक पदार्थों को भूमि में खाद के रूप में उपयोग करके व रसायन रहित अन्य कृषि क्रियाओं को अपनाने की सलाह दी जाती है।

जैविक खेती की आवश्यकता
5 नवंबर, 1972 में फ्रांसीसी किसान संगठन द्वारा जैविक खेती पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय कांगे्रस के दौरान इंटरनेशनल फेडरेशन आॅफ आॅर्गेनिक एग्रीकल्चर मूवमेंट्स का गठन हुआ जो आॅर्गेनिक्स इंटरनेशनल के नाम से जाना जाता है। जिसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण सुरक्षा तथा कृषि रसायनों के उपयोग को कम करना था। जिसके परिणामस्वरूप जैविक खेती के संवर्धन के लिये निम्न उद्देश्य निर्धारित किये गए:
1. मृदा की जैव गुणवत्ता तथा प्राकतिक संसाधनों को बचाए रखना।
2. कृषि उत्पादन में टिकाऊपन लाना।
3. वातावरण प्रदूषण रहित कृषि को बढ़ावा देना।
4. मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभावों को रोकना।
5. जैविक खादों व जैव-उर्वरकों को बढ़ावा देना।
6. जैविक विधियों द्वारा रोग एवं कीट नियंत्रण।
7. परिस्थितिकी तंत्र या जैव विविधता में सुधार करना।
8. उत्पादन लागत को कम करना।
9. निर्यात संभावनाओं को बढ़ावा देना आदि।

जैविक खेती की संभावनाएं:

  • प्रति इकाई क्षेत्र में रसायनों की कम खपत: आज भी हमारे देश में बहुत से गांवों में किसान परंपरागत पद्धति से खेती कर रहे हैं जिसमें फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन, वानिकी तथा पशुओं के लिए चारा प्रबंधन को एकीकृत कर जीवन यापन करते हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र सिक्किम, नागालैंड, असम, ओडिशा आदि प्रांतों में रासायनिक उर्वरकों व दवाइयों का इस्तेमाल न के बराबर होता है। ऐसे सभी किसान जैविक खेती को अपनाकर उच्च गुणवत्तायुक्त उत्पादन प्राप्त कर उचित लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं।
  • खेती के लिए संसाधनों की उपलब्धता: भारत देश में जैविक खेती की तरफ किसान व व्यापारियों का रूझान काफी बढ़ा है। देश की विविध जलवायु, अपार प्राकृतिक संपदा, समृद्ध पशुधन, अच्छे उपभोक्ता बाजार विकसित होने की संभावना, रासायनिक उर्वरकों की प्रति इकाई क्षेत्र में कम खपत आदि जैविक खेती को अपनाने के प्रमुख घटक है।
  • फसल अवशेष तथा कार्बनिक अपशिष्ट पदार्थों की उपलब्धता: हमारे देश में प्रतिवर्ष फसल अवशेष, पेड़-पौधों के पत्ते, कूड़ा-करकटजनित अपशिष्ट पदार्थ व गोबर जैसे कार्बनिक पदार्थों का प्रतिवर्ष अपार मात्रा में उत्पादन होता है जिसके माध्यम से पौधों के लिए आवश्यक खनिज व पोषक तत्वों की पूर्तिकर जैविक खेती को सरल व सुलभ बनाना बहुत ही आसान हो जाता है।
  • जैविक उत्पादकों के निर्यात की संभावना: भारत में विविध जलवायु के कारण अच्छी गुणवत्तायुक्त फसलें जैसे मसाले, औषधीय एवं सुगंधित फसलें, बासमती चावल, फल-सब्जियां, कपास व चाय आदि का निर्यात लंबे समय से होता रहा है और यदि जैविक खेती को अपनाकर इनका निर्यात किया जाए तो अतिरिक्त विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सकती है।
  • जैविक प्रमाणीकरण संस्थाओं की पहुंच: जैविक उत्पादों को विश्वनीय बनाने के लिए जो समस्या उत्पादकों के सामने आती है वह जैविक उत्पादों का प्रमाणीकरण है। आज तक जैविक उत्पादों का प्रमाणीकरण करने वाली संस्थाएं ज्यादातर विदेशी होने के कारण प्रमाणीकरण प्रक्रिया काफी महंगी तथा जटिल पड़ती थी। लेकिन आज के समय में हमारे देश में एपीडा तथा कई अन्य राज्यों में ऐसी संस्थाओं को सरकार ने अधिकृत कर रखा है जो जैविक उत्पादों का प्रमाणीकरण करती हैं जैसे ‘दमदार माटी जैविक प्रसार संस्थान’ हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर व चढ़ीगढ़ में जैविक खेती का प्रमाणीकरण करती है। किसान उत्पादक संगठन जैसी संस्थाएं भी जैविक उत्पादन के साथ-साथ प्रमाणीकरण को भी सरल बनाने में गति प्रदान कर सकती है।
  • जैविक पद्धति के सिद्धांत: जैविक खेती का मूल मंत्र पर्यावरण स्वास्थ्य, आर्थिक समृद्धि, सामाजिक तथा आर्थिक क्षमता का संयोजन करना है। स्वच्छ व उच्च गुणवत्ता वाले खाद्य व रेशा का उत्पादन, उच्च उपज को निरंतर लंबे समय तक प्राप्त करना, पर्यावरण व मृदा उर्वरता में दीर्घ काल के लिए स्थायित्व लाना इस खेती के प्रमुख लक्ष्य हैं। जैविक खेती के सिंद्धात निम्न प्रकार हैं-
    1. स्वास्थ्य सिंद्धात: खेती मानव स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए किसी भी प्रकार के जहरीले रसायनों व उर्वरकों के प्रयोग को प्रतिबंधित करना।
    2. पर्यावरण सिद्धांत: पर्यावरण की स्वच्छता का ध्यान व परिस्थितिकी तंत्र में जैव-विविधता संतुलन को बनाए रखने वाली फसल विविधीकरण जैसी कृषि क्रियाएं करना।
    3. संसाधनों का न्याय संगत उपयोग का सिद्धांत: प्राकृतिक संसाधनों का न्याय संगत उत्पादन व उपयोग करना और आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को बचाकर रखना।
    4. उत्तरदायित्वता का बोध सिंद्धात: खेती के प्रबंधन, उसके विकास तथा नई तकनीकों के चुनाव में सावधानी रखना तथा अपनी उत्तरदायित्वता का बोध भी करना।
  • जैविक खेती के लिए बुनियादी आवश्यकता: किसान को पारंपरिक खेती से जैविक खेती में परिवर्तरित करने से पहले चार बातों की जानकारी होना अति आवश्यक है-
    1. जैविक खेती के मानकों का ज्ञान।
    2. प्रमाणीकरण करने वाली संस्थाओं की जानकारी।
    3. जैविक उत्पादन तथा प्रसंस्करण के तकनीकों की जानकारी।
    4. जैविक उत्पाद के बाजारीकरण की जानकारी।
  • जैविक खेती प्रमाणीकरण: प्रमाणीकरण एक प्रकिया आधरित प्रणाली है जिसमें किसी भी प्रकार के कृषि उत्पाद, उनका प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन तथा वितरण प्रणाली का प्रमाणीकरण किया जाता है। इसके निर्धारण के लिए अलग-अलग देशों के अपने मानक हैं और अलग-अलग प्रणाली द्वारा वे प्रमाणीकरण करते हैं। एक फार्म या भू-भाग के जैविक प्रमाणीकरण के लिए प्रार्थी या उत्पादक को जैविक मानकों का चरणबद्ध तरीके से अनुसरण करना होता है जिसमें भारत सरकार के राष्ट्रीय जैविक उत्पादन मानकों के दिशा-निदेर्शों का पालन करना होता है। यह मानक निम्न बातों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं –
    1. सभी संश्लेषित रासायनिक आदानों- उर्वरक, कीटनाशक, रोगनाशक व खरपतवारनाशक पदार्थों के प्रयोग पर प्रतिबंध।
    2. ऐसी भूमि जिसमें पिछले कम से कम 2 या 3 वर्षो से रासायनिक आदानों का प्रयोग नहीं किया गया है। प्रमाणीकरण प्रक्रिया के अंतर्गत लाई जा सकती है।
    3. सभी कृषि प्रक्रियाओं के कार्यकलापों का लेखा-जोखा रखना।
    4. जैविक व अजैविक उत्पादन इकाइयों को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रखना।
    5. समय-समय पर प्रमाणीकरण संस्थाओं द्वारा निरीक्षण कर जैविक मानकों का पालन सुनिश्चित करना।
  • प्रमाणीकरण की आवश्यकता क्यों: ग्राहकों को उच्च गुणवत्ता का उत्पाद सुनिश्चित करने तथा धोखाधड़ी से बचाने के लिए प्रमाणीकरण एक आवश्यक प्रक्रिया है। उत्पादकों के लिए प्रमाणीकरण जहां बाजार को सुलभ बनाना है, वही ग्राहकों को यह सुरक्षा व गुणवत्ता की गांरटी प्रदान करता है। हमारे देश में अनेक उत्पादों पर ‘आईएसआई’ मार्क या खाद्य सामग्रियों पर ‘एगमार्क’ लगाया जाता है। ठीक उसी प्रकार से जैविक उत्पादों पर प्रमाणीकरण के पश्चात ‘इंडिया आॅर्गेनिक’ मार्क लगाया जाता है जो जैविक उत्पाद मानकों पर खरा होने की गांरटी देता है।-

करण सिंह सैनी, संदीप रावल, आराधना बाली एवं नरेन्द्र गोयल
कृषि विज्ञान केन्द्र, यमुनानगर, हरियाणा

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