Krishi Chaupal

पंचायती राज और ग्राम पंचायत

पंचायती राज और ग्राम पंचायत

Sep 13, 2023
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भारतीय संविधान में शासन चलाने से सम्बन्धित कुछ निर्देशक सिद्धांतों का भी उल्लेख है। इन्हें राज्य के नीति-निर्देशक तत्व कहते हैं। इन सिद्धांतों में से एक सिद्धांत यह है कि भारत की सरकार देश में ग्राम स्वशासन की दिशा में कार्रवाई करे। इस निर्देश के अनुपालन के लिए 1992 में संविधान में 73वाँ संशोधन किया गया। इस संशोधन के द्वारा देश में पंचायती राज की व्यवस्था लागू की गई। यह व्यवस्था त्रि-स्तरीय है- ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद्। पंचायती राज व्यवस्था लागू करने करने के लिए राज्यों को अपने नियम एवं विनियम बनाने का अधिकार है। यही कारण है कि आपको अलग-अलग राज्यों में कामकाज के तौर-तरीकों, पदनाम और आरक्षण आदि मामलों के प्रावधानों में विविधता देखने को मिलती है।

भारत में ‘पंचायती राज’ की स्थापना के उद्देश्य से ही भारत सरकार ने बलवंतराय मेहता की अध्यक्षता में एक समिति की नियुक्ति की थी। इस समिति ने भारतीय लोकतंत्र की सफलता के लिए लोकतंत्र की इमारत को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया। इसके लिए उसने प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण के सिद्धांत को लागू करने की सिफारिश की। इस समिति ने निम्नलिखित सुझाव दिए –

1) सरकार को अपने कुछ कार्यों और उत्तरदायित्वों से मुक्त हो जाना चाहिए और उन्हें एक ऐसी संस्था को सौंप देना चाहिए, जिसके क्षेत्राधिकार के अंतर्गत विकास के सभी कार्यों की पूरी जिम्मेदारी रहे। सरकार का काम सिर्फ इतना रहे कि वह इन संस्थाओं को पथ-प्रदर्शन देती रहे और निरीक्षण करती रहे।
2) लोकतंत्र की आधारशिला को मजबूत बनाने के लिए राज्यों की उच्चतर इकाइयों (जैसे प्रखंड, जिला) से ग्राम पंचायतों का अटूट सम्बन्ध स्थापित होना चाहिए। इसके लिए प्रखंड और जिले में भी पंचायती राज व्यवस्था को अपनाना आवश्यक है।
3) प्रखंड-स्तर पर एक निर्वाचित स्वायत्त शासन वाली संस्था की स्थापना की जाए जिसका नाम पंचायत समिति रखा जाए। इस पंचायत समिति का संगठन ग्राम पंचायतों द्वारा किया जाए।
4) जिला-स्तर पर एक निर्वाचित स्वायत्त शासन वाली संस्था की स्थापना की जाए जिसका नाम जिला परिषद् रखा जाए। इस जिला परिषद् का संगठन पंचायत समितियों द्वारा किया जाए।

ग्राम पंचायत का गठन

1) सरपंच
ग्राम पंचायत की न्यायपालिका को ग्राम कचहरी कहते हैं जिसका प्रधान सरपंच होता है। सरपंच का निर्वाचन मुखिया की तरह ही प्रत्यक्ष ढंग से होता है। सरपंच का कार्यकाल 5 वर्ष है। उसे कदाचार, अक्षमता या कर्तव्यहीनता के कारण सरकार द्वारा हटाया भी जा सकता है। अगर दो तिहाई पंच सरपंच के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पास कर दें तो सरकार सरपंच को हटा सकती है। सरपंच का प्रमुख कार्य ग्राम कचहरी का सभापतित्व करना है। कचहरी के प्रत्येक तरह के मुकदमे की सुनवाई में सरपंच अवश्य रहता है। सरपंच ही मुकदमे को स्वीकार करता है तथा मुकदमे के दोनों पक्षों और गवाहों को उपस्थित करने का प्रबंध करता है। वह प्रत्येक मुकदमे की सुनवाई के लिए दो पंचों को मनोनीत करता है। ग्राम कचहरी की सफलता बहुत हद तक उसकी योग्यता पर निर्भर करती है।

2) मुखिया
ग्राम पंचायत के अंतर्गत मुखिया का स्थान महत्वपूर्ण है। उसकी योग्यता तथा कार्यकुशलता पर ही ग्राम पंचायत की सफलता निर्भर करती है। मुखिया ग्राम पंचायत की कार्यकारिणी समिति के चार सदस्यों को मनोनीत करता है। मुखिया का कार्यकाल 5 वर्ष है, परन्तु ग्राम पंचायत अविश्वास प्रस्ताव पास कर मुखिया को पदच्युत कर सकती है। पंचायत के सभी कार्यों की देखभाल मुखिया ही करता है। मुखिया अपनी कार्यकारिणी समिति की सलाह से ग्राम पंचायत के अन्य कार्य भी कर सकता है। ग्राम पंचायत में न्याय तथा शान्ति की व्यवस्था करने का उत्तरदायित्व उसी पर है। उसकी सहायता के लिए ग्रामरक्षा दल भी होता है। उसे ग्राम-कल्याण के कार्यों के लिए बड़े-बड़े सरकारी पदाधिकारियों के समक्ष पंचायत का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है। वह ग्रामीण अफसरों के आचरण के विरुद्ध शिकायत भी कर सकता है।

3) पंचायत सेवक
प्रत्येक ग्राम पंचायत का एक कार्यालय होता है, जो एक पंचायत सेवक के अधीन होता है। पंचायत सेवक की नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा होती है। उसे राज्य सरकार द्वारा निर्धारित वेतन भी मिलता है। ग्राम पंचायत की सफलता पंचायत सेवक पर ही निर्भर करती है। वह ग्राम पंचायत के के सचिव के रूप में कार्य करता है और इस नाते उसे ग्राम पंचायत के सभी कार्यों के निरीक्षण का अधिकार है। वह मुखिया, सरपंच तथा ग्राम पंचायत को कार्य-सञ्चालन में सहायता देता है। राज्य सरकार द्वारा उसका प्रशिक्षण होता है। ग्राम पंचायत के सभी ज्ञात-अज्ञात प्रमाण पंचायत सेवक के पास सुरक्षित रहते हैं। अत: वह ग्राम पंचायत के कागजात से पूरी तरह परिचित रहता है और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें पेश करता है। संक्षेप में, ग्राम पंचायत के सभी कार्यों के संपादन में उसका महत्वपूर्ण स्थान है।

4) ग्रामरक्षा दल
18 से 30 वर्ष के स्वस्थ युवकों से ग्रामरक्षा दल बनता है, जिसका संगठन ग्राम पंचायत करती है। इसका काम गांव की रक्षा करना होता है। चोरी, डकैती, आगजनी, बाढ़, आपदा, महामारी इत्यादि आकस्मिक घटनाओं के समय यह दल गांव की रक्षा करता है।

ग्राम पंचायत के कार्य

1) पंचायत क्षेत्र के विकास के लिए वार्षिक योजनाएं तैयार करना
2) वार्षिक बजट तैयार करना
3) प्राकृतिक आपदा में सहायता कार्य करना
4) लोक संपत्ति से अतिक्रमण हटाना
5) कृषि और बागवानी का विकास करना
6) बंजर भूमि का विकास करना
7) पशुपालन, डेयरी उद्योग और मुगीर्पालन जैसे रोजगारोन्मुख कार्य करना
8) चारागाह का विकास करना
9) गांवों में मत्स्य पालन का विकास करना
10) सड़कों के किनारे और सार्वजनिक भूमि पर वृक्षारोपण करना
11) ग्रामीण, खादी एवं कुटीर उद्योगों का विकास करना
12) ग्रामीण गृह-निर्माण, सड़क, नाली पुलिया का निर्माण एवं संरक्षण करना
13) पेय जल की व्यवस्था करना
14) ग्रामीण बिजलीकरण एवं गैर-परंपरागत ऊर्जास्रोतों की व्यवस्था एवं संरक्षण
15) प्राथमिक एवं माध्यमिक विद्यालयों सहित शिक्षा, वयस्क एवं अनौपचारिक शिक्षा, पुस्तकालय, सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि की व्यवस्था करना
16) ग्रामीण स्वस्थता, लोक स्वास्थ्य, परिवार कल्याण कार्यक्रम, महिला एवं बाल विकास, विकलांग एवं मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों, कमजोर वर्ग खासकर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के कल्याण-सबंधी कार्यक्रमों को पूरा करना
17) जन वितरण प्रणाली की व्यवस्था करना
18) धर्मशालाओं, छात्रावासों, तालाबों, कसाईखानों, सार्वजनिक पार्क, खेलकूद का मैदान, झोपड़ियों का निर्माण एवं व्यवस्था करना

ग्राम पंचायत की आय के स्रोत

1) भारत सरकार से प्राप्त अंशदान, अनुदान या ऋण अथवा अन्य प्रकार की निधियां
2) राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त चल एवं अचल सपंत्ति से प्राप्त आय
3) भूराजस्व एवं सेस से प्राप्त राशियां
4) राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त अंशदान, अनुदान या ऋण सबंधी अन्य आय
5) राज्य सरकार की अनुमति से किसी निगम, निकाय, कंपनी या व्यक्ति से प्राप्त अनुदान या ऋण
6) दान के रूप में प्राप्त राशियां या अंशदान
7) सरकार द्वारा निर्धारित अन्य स्रोत

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