Krishi Chaupal

बकरियों में होने वाली मुख्य बीमारियां

बकरियों में होने वाली मुख्य बीमारियां

Sep 13, 2023
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बीमारियों की वजह से किसान को पशुओं के स्वास्थ्य और उत्पादन में भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। पशुओं में होने वाली बीमारियों के रोकथाम व उचित इलाज से इस आर्थिक नुकसान को कम किया जा सकता है। पशुओं में रोग प्रबंधन कर अपने देश में पशुपालन को एक नये आयाम तक पहुंचाया जा सकता है। पर्यावरण में संक्रमण के कारकों की उपस्थिति से पशु उत्पादों की गुणवत्ता और मात्रा में कमी आती है। बकरियों के रोगों को मुख्य रूप से गैर-संक्रामक और संक्रामक रूप में वगीर्कृत किया जा सकता है। संक्रामक रोगों के लिये टीकाकरण एक महत्वपूर्ण घटक है।

मुख्य बीमारियां

फड़किया: बकरियों में होने वाली यह एक प्रमुख बीमारी है जो अधिकतर वर्षा ऋतु में फैलती है। एक साथ बाड़े में अधिक बकरियां रखने, आहार में अचानक परिवर्तन होने तथा अधिक प्रोटीनयुक्त हरा चारा खा लेने से यह रोग तीव्रता से बढ़ता है।
यह रोग क्लोस्ट्रीडियम परफिजेन्स नामक जीवाणु के विष के कारण उत्पन्न होता है। साधारणत: इस बीमारी में आफरा हो जाता है। अधिक ध्यान से देखने पर बकरी के अंगों में फड़कन (कंपन) दिखाई देती है। इसी कारण इस रोग को फड़किया कहते हंै। इस रोग में पशु लक्षण प्रकट करने के 3-4 घंटों में मर जाता है। पेट में दर्द के कारण बकरी पिछले पैरों को पेट पर मारती है तथा सुस्त होकर मर जाती है।

चेचक (माता): यह एक विषाणुजनित रोग है जो रोगी बकरी के संपर्क में आने से फैलता है। इस रोग में बकरी के शरीर के ऊपर दाने निकल आते हैं। बीमार बकरियों को बुखार हो जाता है साथ ही कान, नाक, थनों व शरीर के अन्य भागों पर गोल-गोल लाल रंग के चकत्ते हो जाते हैं जो फफोले का रूप लेकर अंत में फूट कर घाव बन जाते हैं। बकरी चारा खाना कम कर देती है तथा उसका दूध उत्पादन कम हो जाता है। कहीं पर यदि पानी रखा हो तो पशु अपना मुंह पानी में डालकर रखता है।
रोग के प्रकोप से बचने के लिए प्रतिवर्ष वर्षा से पहले बकरी को रोग-प्रतिरोधक टीके लगवाने चाहिए। बीमारी होने पर प्रतिजैविक दवाइयों का प्रयोग करना चाहिए। जिससे दूसरे प्रकार के कीटाणुओं के प्रकोप को रोका जा सके। बीमार पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग रखना चाहिए तथा रोगी पशु के बिछौने तथा खाने से बची हुई सामग्री और मृत पशु को जलाकर या जमीन में गाड़ देना चाहिए।

खुरपका-मुंहपका रोग: यह बकरियों का एक संक्रामक रोग है। यह रोग वर्षा ऋतु के आने के बाद आरंभ होता है। इस रोग में बकरियों के मुंह व खुर में छाले पड़ जाते हैं तथा मुंह से लार टपकती रहती है, जिससे बकरी चारा नहीं खा पाती है। पैरों में जख्म होने से बकरियां लंगड़ाकर चलने लगती हैं। चारा न खा पाने से बकरियां कमजोर हो जाती हैं। जिससे इनमें मृत्युदर बढ़ जाती है तथा इनका वजन व उत्पादन भी कम हो जाता है।
इस रोग के विषाणु रोगी पशुओं से संक्रमित आहार व जल के ग्रहण करने से स्वस्थ बकरियों में प्रवेश करते हैं। इस रोग से प्रभावित बकरियों के अंगो को लाल दवा के घोल से धोना चाहिए। छालों पर मुख्य रूप से ग्लिसरीन लगाना फायदेमंद है। वर्षा ऋतु से पहले बसंत के आरंभ में बकरियों को पोलीवेलेन्ट टीका लगा देना चाहिए। रोगी पशुओं को स्वस्थ पशुओं से अलग कर देना चाहिए तथा स्वस्थ होने के बाद ही समूह में वापस रखना चाहिए।

न्यूमोनिया रोग: इसे फेफडेÞ का रोग भी कहते हैं। बकरियों में श्वास संबंधी बीमारी या न्यूमोनिया रोग प्राय: अधिक होते हैं। इस रोग में पशु के फेफड़ो व श्वसन तंत्र में सूजन आ जाती है जिससे उन्हें श्वास लेने में कठिनाई आती है। इस रोग के कारण बकरियों तथा उनके बच्चों में मृत्युदर अधिक होती है। यह रोग जीवाणु व विषाणु दोनों के प्रभाव से पनप सकता है लेकिन पाश्च्युरेल्ला हीमोलिटीका नामक जीवाणु इस रोग को फैलाने में काफी सक्रिय माना जाता है। ठंडे तथा प्रतिकूल मौसम के कारण यह रोग अति तीव्रता से फैलता है। इसमें बकरी को तेज बुखार आता है तथा मुंह-नाक से तरल स्राव निकलता है। बकरी खाना-पीना छोड़ देती है तथा समूह से अलग खड़ी रहती है। छोटे बच्चों को यह रोग विशेष रूप से प्रभावित करता है।
न्यूमोनिया एक श्वास रोग होने के कारण इसके रोगी पशु के संूघने व छींकने मात्र से इसके कीटाणु स्वस्थ पशु में प्रवेश कर जाते हैं। यदि बकरियों में जीवाणु जनित न्यूमोनिया का पता जल्द चल जाए तो प्रतिजैविक दवाइयों से इस रोग का निदान किया जा सकता है।
विषाणुजनित रोग में प्रतिजैविक दवाइयां देने से दूसरे जीवाणुओं को बढ़ने से रोका जा सकता है। पाश्च्युरेल्ला से जनित न्यूमोनिया में स्ट्रेप्टोसिलीन व एम्पीसिलीन 3-4 दिन देने से अधिक लाभ मिलता है। माइक्रोप्लाज्मा जनित न्यूमोनिया में आक्सीटेट्रासाइक्लिन काफी उपयोगी है। बकरियों के आवास व वातावरण का उचित प्रबंध करने से व पूर्ण आहार देने से रोग की संभावना कम हो जाती है। बकरियों व बच्चों को अधिक ठंड व वर्षा से बचाने का उपाय करना चाहिए। बीमार बकरी को अलग रखकर उपचार करना चाहिए।

जोन्स रोग: इस रोग का प्रमुख लक्षण बकरी का दिन-ब-दिन कमजोर होना व उसकी हड्डियां दिखाई देना है। यह रोग, रोगी बकरी के संपर्क में आने से फैलता है। इस बीमारी के लिए कोई विशेष टीका उपलब्ध नहीं है तथा अंत में बकरी मर जाती है। यह एक जानलेवा बीमारी है। जिस बाड़े में यह फैल जाती है, उस बाडेÞ की बकरियां धीरे-धीरे मर जाती हैं। इसलिए जैसे ही इस बीमारी से ग्रस्त पशु दिखाई दे, उसे तुरंत हटा देना चाहिए। बाड़े में अधिक भीड़ नहीं होने देनी चाहिए।

जीवाणु-गर्भपात: जिस बकरी का एक बार बच्चा गिर जाता है वह बकरी पशुपालक के लिए अगले बच्चे तक भार बन जाती है जिससे बकरी-पालक को आर्थिक हानि का सामना करना पड़ता है। गर्भपात एक संक्रामक रोग है। ब्रुसेल्लोसिस, सालमोनेल्लोसिस, विब्रियोसिस एवं क्लेमाइडियोसिस आदि इस रोग के मुख्य कारण है। रोगी बकरी से जीवाणु मूत्र, गोबर, प्लेसेन्टा आदि द्वारा बाहर निकलते हैं तथा स्राव से सने हुए चारे को खाने, योनि को चाटने आदि के कारण पशु का बार-बार बच्चा गिर जाता है। रोगी बकरी के संपर्क द्वारा यह रोग बकरों के जननेन्द्रियों को प्रभावित करके रोगग्रस्त कर देता है जो कि इस रोग के संवाहक बन जाते हैं। रोगग्रस्त बकरी में मुख्य लक्षण गर्भपात होना है। गर्भपात होने से पूर्व योनि में सूजन आ जाती है, बादामी रंग का स्राव निकलता है व थन सूज कर लाल हो जाते हैं।
इस बीमारी के इलाज व रोकथाम के लिए रोगी पशु को एकदम अलग कर देना चाहिए। इनके बाड़े को साफ रखना चाहिए। रोगी बकरी के पिछले भाग को कीटनाशक दवाइयों से साफ करते रहना चाहिए तथा योनि में भी फुरियाबोलस व हेबेटीन पैसरी आदि रखनी चाहिए। रोगग्रस्त मादा को समूह में नहीं रखना चाहिए एवं न ही प्रजनन के काम में लेना चाहिए।

खुरगलन रोग: बकरियों में वर्षा से सर्दियों तक होने वाला यह प्रमुख रोग है। यह रोग स्प्रेफोरस, नेफ्रोफोरस नामक जीवाणु से पैदा होता है। मुख्य रूप से यह रोग गीली मिट्टी व वर्षा ऋतु में अधिकता से फैलता है। इस रोग में बकरी एक या अधिक पैरों से लंगड़ाकर चलती है व धीरे-धीरे कमजोर हो जाती है। इसमें खुरों के बीच का मांस व खाल सड़कर मुलायम पड़ जाता है तथा इससे अजीब सी दुर्गंध आती है।
इस रोग से बचाव के लिए बाड़े के दरवाजे पर पैर स्नान (फुट बाथ) बनाकर नीला थोथा आदि दवा के घोल में करीब 5 मिनट तक पशु को खड़ा करने के बाद चरने भेजना चाहिए। खुर के बीच के घाव को ठीक से साफ कर दस प्रतिशत नीला थोथा या पांच प्रतिशत फार्मलिन से धोने पर आराम मिलता है तथा रोग का प्रकोप भी कम हो जाता है। इस रोग से बचाव के लिए पशुओं को गीले चरागाह में चरने के लिए नहीं भेजना चाहिए। खुरों के बढ़े हुए भाग को काटकर निकालते रहना चाहिए।

अफारा: यह बकरियों में मुख्य रूप से पाया जाने वाला रोग है। इसमें गैसों के बनने व एकत्रित होने से पेट फूल जाता है। यह रोग अधिकतर वर्षा व उसके बाद में जरूरत से अधिक हरा चारा, सड़ा व फफुंदयुक्त चारा खा लेने से होता है। इससे अधिक गैस बनती है। कई बार बहुत सी बीमारियों की वजह से पशु बहुत समय तक एक ही करवट लेटा रहता है तब उसकी पाचन क्रिया सही ढंग से नहीं हो पाती है जिससे पेट में गैस एकत्रित होकर इस रोग का कारण बनती है।
पेट में बनी गैसें शरीर से बाहर न निकलने पर अंदर के अन्य भागों में दबाव डालती है जिससे मुख्य रूप से फेफड़े प्रभावित होते हैं तथा पशु को श्वास लेने में परेशानी होती है। पशु काफी बेचैन हो जाता है व बायीं ओर का भाग फूल जाता है। यदि पेट पर हल्के हाथ से मारे तो ढप-ढप की आवाज आती है। पशु के मुंह से झाग आने लगता है तथा दर्द के कारण पेट पर लात मारता है। समय पर उपचार न होने पर बकरी की मृत्यु भी हो जाती है।
आफरा की पहचान होने पर पशु चिकित्सक को बुलाकर ट्रोकार कैन्युला की सहायता से पेट की गैस निकाल दें। बकरी की आगे की टांगें ऊंचाई पर रखकर धीरे-धीरे पेट की मालिश करें जिससे गैस पेट से बाहर निकल जाये तथा फेफड़ों पर दबाव कम पड़े। पशु को तारपीन का तेल 10-15 ग्राम, हींग 2 ग्राम व अलसी का तेल 70 ग्राम मिलाकर पिलाने से लाभ मिलता है। पिलाते वक्त ध्यान रखें कि तेल फेफड़ों में न जाएं। बकरियों को केवल हरा व भीगा चारा नहीं खिलाना चाहिए। आफरा से बचाने के लिए पशुओं को सड़ा-गला चारा व अधिक मात्रा में दाना नहीं खिलाना चाहिए।

दस्त: यह रोग मुख्य रूप से बच्चों में 2-3 सप्ताह में होता है। इस रोग का मुख्य रोगकारक ई. कोलाई नामक जीवाणु होता है। बच्चों में इस रोग के कारण बुखार आ जाता है व तेज दस्त होने लगता है तथा बच्चा खाना-पीना छोड़ देता है। इस रोग से बचाव के लिए बच्चों को शुरू में दिन में 3-4 बार आवश्यकतानुसार खीस पिलाना चाहिए जिससे उनमें रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। इस रोग में प्रतिजैविक दवाइयां जैसे डाइजीन, नियोमाइसिन व सेप्ट्रोन इत्यादि लाभदायक सिद्ध होती है।

डॉ. सुदीप सोलंकी, सहायक आचार्य (वेटनरी माइक्रोबायोलॉजी);
डॉ. दुर्गा गुर्जर, टीचिंग एसोसिएट, पशुचिकित्सा महाविद्यालय,
नवानियां, उदयपुर, राजस्थान

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