गढ़वाली थियेटर: यात्रा जारी है!
– सुरेश नौटियाल
यहां गढ़वाली नाटकों पर विशेषरूप से बातचीत हो रही है. इसलिए यह स्मरण करना आवश्यक है कि गढ़वाल में नाटकों से पहले परंपरागत मनोरंजन के माध्यमों या साधनों में पांडवनृत्य, लांग, भैलानृत्य, ऋतुनृत्य, चौंफला, झुमेलो, छोपती, तांदीनृत्य, थड्या और स्वांग जैसी अनेक विधाएं रही हैं. समय के साथ-साथ रामलीला ने भी जनमानस में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया.
नृत्य-नाटिकाओं में पौराणिक आख्यानों, कथाओं और किंवदंतियों को आधार बनाया जाता रहा है. इसी के परिणामस्वरूप उत्तराखंडी रंगमंच का मूलस्रोत वहां के धार्मिक आख्यानों, उत्सवों, कौथिगों इत्यादि में देखा जा सकता है. पांडव-नृत्य को तो गढ़वाली रंगमंच का आदिस्थ ही कहा जा सकता है, क्योंकि इस नृत्य में नाटक के अनेक तत्व यथा संघर्ष, गतिशीलता, कथा-प्रवाह, चरित्र-चित्रण स्वाभाविक रूप में विद्यमान हैं. पांडव-नृत्य के साथ बजने वाले वाद्य-यंत्र ढोल-दमाऊं सहज ही नाटकीयता का वातावरण पैदा कर देते हैं. जागर कथाओं में भी इस तरह का वातावरण डौंर-थाली और हुड़के जैसे वाद्य-यंत्र पैदा करते हैं.
गढ़वाली नाट्य परंपरा और यात्रा:
गढ़वाली नाटकों का जैसे-जैसे विकास हुआ, उनमें स्थानीय जन-जीवन और उसके धार्मिक पक्ष के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक पक्ष भी सामने आने लगे. देशव्यापी नाट्य-आंदोलन का प्रभाव गढ़वाली नाट्य-परंपरा पर सहज ही देखा जा सकता है. प्रथम विश्व-युद्ध के बाद देश में पारसी थियेटर ने जोर पकड़ा तो गढ़वाली थियेटर पर भी इसका प्रभाव पड़ा और बीस-तीस के दशक के आते-आते पारसी थियेटर के नमूने पर “श्रीकृष्णावतार”, “सत्यवादी हरिश्चंद्र”, “दानवीर कर्ण” और “धर्मराज युधिष्ठिर” जैसे पौराणिक विषयक नाटक खेले जाने लगे. कुल मिलाकर, शीतऋतु में रामलीला का आयोजन होता तो ग्रीष्मऋतु में नाटकों का मंचन.
गढ़वाली का पहला नाटक लिखने का श्रेय भवानीदत्त थपलियाल को जाता है. उन्होंने 1911 में “जय-विजय” नाटक लिखा और तीन वर्ष बाद 1914 में “प्रह्लाद नाटक” लिखा. “प्रह्लाद नाटक” की लोकप्रियता बराबर बनी रही और 1930 में “प्रह्लाद नाटक” को प्रकाशित कर दिया गया. उन्हीं दिनों फरवरी 1930 में घनानंद बहुगुणा का नाटक “समाज” लखनऊ से छपा. इसके दो साल बाद उत्तराखंड प्रेस देहरादून से विश्वंभरदत्त उनियाल का नाटक “बसंती” प्रकाशित हुआ. वर्ष 1934 में ईश्वरीदत्त जुयाल ने कराची से अपना नाटक “परिवर्तन” छपवाया. इसके दो वर्ष बाद 1936 में टिहरी रियासत के वाणीभूषण शर्मा ने अपना नाटक “प्रेम सुमन” प्रकाशित किया. वर्ष 1932-33 में टिहरी के शेमियर ऑफीशियल ड्रामैटिक क्लब ने चार मित्रों द्वारा लिखी नाटिका “पांखु” का मंचन किया और 1936 में उत्तराखंड प्रेस देहरादून ने इसे छापा. तदुपरांत, 1940 में भगवतीप्रसाद पांथरी के नाटक “भूतों की खोह” और “अध:पतन” सामने आए. उनके नाटकों में स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में पर्वतीय लोगों की मनोदशा का चित्रण विशेष है.
गढ़वाली थियेटर में पहला मोड़:
पचास का दशक गढ़वाली नाटकों के लेखन की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा. इसी दशक में जीत सिंह नेगी का नाटक “भारी भूल” प्रकाशित हुआ और दिल्ली, मुम्बई और देहरादून में इसका मंचन अनेक बार हुआ. जीत सिंह नेगी ने “मलेथा की कूल” नामक नाटक भी लिखा तथा बलदेव प्रसाद सती के गीत “रामी” को आधार बनाकर गीत-नाटिका भी लिखी. उनके अलावा, केशव ध्यानी ने “मालू सौकार” और “कखी नाक न, कखी सोनु न” तथा मदन डोभाल ने “खबेश” जैसे नाटक लिखे. जीत सिंह नेगी का नाटक “भारी भूल” दिल्ली में सर्वप्रथम 1950 में खेला गया और पहली बार दो महिला कलाकारों – कांता थपलियाल और कमला थपलियाल – ने इसमें अभिनय किया. जीत सिंह नेगी के ही दूसरे नाटक “मलेथा की कूल” को भी दर्शकों ने काफी सराहा. श्रीधर जमलोकी का नाटक “सीता परित्याग” और विशालमणि शर्मा के नाटक “श्रीकृष्ण” और “भक्त ध्रुव” भी गढ़वाल में मंचित हुए.
गढ़वाली थियेटर में दूसरा मोड़:
पचास के ही दशक में गढ़वाली रंगमंच को दूसरा महत्वपूर्ण मोड़ ललितमोहन थपल्याल ने दिया. इनके चार एकांकी – “खाडू लापता”, “अछर्यूं कू ताल”, “घर जवैं” और “एकीकरण” – दिल्ली और दिल्ली के बाहर छठे दशक तक लोकप्रिय रहे. ललितमोहन थपल्याल ने 1958 में “प्रह्लाद नाटक” के एक भाग को रूपांतरित करके “दुर्जन की कछड़ी” नाम से उसका मंचन किया. ऐसा करके ललितमोहन थपल्याल ने यह दिखाने का प्रयास किया कि उत्तराखंडी भाषाएं नाटक के लिए अत्यंत सप्राण और सशक्त माध्यम हैं. ललितमोहन थपल्याल ने गढ़वाली रंगमंच की संभावनाओं का संकेत भी स्पष्ट रूप में दिया. इनके नाटकों में जो सबसे महत्वपूर्ण गुण है, वह है इनका भाषिक सौंदर्य! उनके नाटकों में हास-परिहास के माध्यम से समाज की विसंगतियां भी तीखे रूप में सामने आती हैं.
ललितमोहन थपल्याल के नाटकों से अन्य लोगों ने भी प्रेरणा ली और गिरधारी प्रसाद थपलियाल ‘कंकाल’ ने “इन भि चल्द”, वीरेन्द्र मोहन रतूड़ी ने “एक जौ अगनै” तथा किशोर घिल्डियाल ने “रग-ठग”, “दूणों जनम” और “कीडू की ब्वे” जैसे नाटक लिखे.
इस बीच, भगवती प्रसाद चंदोला, हरिदत्त भट्ट ‘शैलेश’, डॉ. गोविंद चातक, अबोधबंधु बहुगुणा, आचार्य पुरुषोत्तम डोभाल, दामोदर प्रसाद थपल्याल, सुरेन्द्र सिंह रावत और गोविंदराम पोखरियाल के नाटक भी सामने आए लेकिन इनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिल पाई है. कन्हैयालाल डंडरियाल ने भी “सीता स्वयंबर” और “कंसवध” जैसे नाटक लिखे.
गढ़वाली थियेटर में तीसरा मोड़:
इसके बाद गढ़वाली रंगमंच में तीसरा महत्वपूर्ण मोड़ आया सत्तर-अस्सी के दशक में राजेन्द्र धस्माना के नाटकों के साथ. राजनीतिक व्यंग्य और सम-सामयिक समस्याओं पर पैनी दृष्टि और पकड़ का उन्होंने परिचय दिया. गढ़वाली रंगमंच को आधुनिक रंगमंच की अपेक्षाओं के अनुरूप ढालने में राजेन्द्र धस्माना का योगदान विशेषरूप से उल्लेखनीय है. अपने पहले ही नाटक “जंकजोड़” से उन्होंने गढ़वाली रंगमंच को पुरानी लीक से हटाकर आगे बढाया और उसे समाज की समसामयिक परिस्थितियों से जोड़कर देश के भाषी थियेटर के समक्ष लाने में योगदान किया.
पहाडी गांव के विकास के लिए शहरी लोगों की चिंता के ताने-बाने पर कसा राजेन्द्र धस्माना के दूसरे नाटक “अर्द्धग्रामेश्वर” के अनेक प्रदर्शन “जागर” और “द हाई हिलर्स ग्रुप” जैसी अनेक रंगमंडलियों ने कई शहरों में किए. कहा जा सकता है कि “अर्द्धग्रामेश्वर” नाटक गढ़वाली थियेटर में माइलस्टोन अर्थात मील का पत्थर है. इस नाटक का हिंदी में भी अनुवाद किया गया. धस्माना ने भवानीदत्त थपलियाल के “प्रह्लाद नाटक” को भी अपडेट किया और कन्हैयालाल डंडरियाल की रचना “कंसवध” का पुनर्लेखन राजनीतिक व्यंग्य “कंसानुक्रम” के नाम से किया. महेश एलकुंचवार के एक मराठी नाटक का “पैसा न ध्यल्या, गुमान सिंह रौत्यल्या” के नाम से भी धस्माना ने रूपांतरण किया. “जै भारत, जै उत्तराखंड” उनका अंतिम मंचित नाटक है. उनके नाटक “भड़ भंडारी माधो सिंह” का अभी तक मंचन नहीं हो पाया है.
गढ़वाली नाटकों को मित्रानंद मैठाणी के लेखन से भी बल मिला. उन्होंने “खौल्या”, “च्यूं”, “चौकड़ी”, “फुलमुंडी सासु” जैसे नाटकों का लेखन और आकाशवाणी से प्रसारण किया. पारेश्वर गौड़ का नाटक “औंसी कि रात”, स्वरूप ढौंडियाल के नाटक “अदालत” और “मंगतू बौल्या” और उमाकांत बलूनी का नाटक “बांजि गौड़ी” भी महत्वपूर्ण गढ़वाली नाटक हैं.
अस्सी के दशक में ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के फेलो श्रीश डोभाल ने उत्तराखंड के विभिन्न नगरों-कस्बों में रंग-कार्यशालाएं आयोजित कीं और “शैलनट” नामक नाट्यमंडली का गठन उत्तराखंड के विभिन्न नगरों में किया. कला दर्पण उत्तरकाशी और कला दर्पण दिल्ली जैसी अनेक रंगमंडलियां का योगदान भी महत्वपूर्ण है, जिन्होंने पर्वतीय विषयों पर हिंदी में नाटक आयोजित किये. कला दर्पण दिल्ली की प्रस्तुतियां – “बीस सौ बीस”, “ढोल के बोल” और “नीली छतरी” – कुछ ऐसे उदाहरण हैं. सुभाष रावत द्वारा लिखित और सुवर्ण रावत द्वारा निर्देशित “बीस सौ बीस” नाटक उत्तराखंड राज्य निर्माण की पृष्ठभूमि पर है.
नब्बे के दशक में “जागर” ने गढ़वाली नाट्य आन्दोलन को आगे बढाने का प्रयास किया. राजेन्द्र धस्माना के नाटक “पैसा न ध्यला, गुमान सिंह रौत्यला” के मंचन से इस आन्दोलन को बल मिला. लेकिन, इस दौर में असल काम “द हाई हिलर्स ग्रुप” ने किया. इस ग्रुप ने जो नाटक खेले उनमें उमाकांत बलूनी का नाटक “बांजी गौडी” (1987), डॉ. कुसुम नौटियाल का नाटक “लिंडरिया छोरा” (1991), धीरज नेगी का नाटक “जैसिंह काका” (1992), राजेन्द्र धस्माना के नाटक “पैसा न ध्यला, गुमान सिंह रौत्यला” (1992) और “जै भारत, जै उत्तराखंड” (1995) ललितमोहन थपल्याल का नाटक “चमत्कार” (1999), दिनेश बिजल्वाण और मोहन बिष्ट का नाटक “कैकु ब्यौ, कैकु ख्यौ” (2001) और दिनेश बिजल्वाण का नाटक “पल्टनेर चन्द्र सिंह” (2002) प्रमुख रहे.
1974 में स्थापित “उदंकार” संस्था ने 1986 तक मदन डोभाल के नाटक “खबेश”, एचएस रावत के नाटक “अब दिख्या तब” और “कुज्यणि क्य होंद”, स्वरूप ढौंडियाल के नाटक “अदालत” और “मंगतू बौल्या”, राजेन्द्र धस्माना के नाटक “जंकजोड़”, मोहन बिष्ट के नाटक “द्यूर भौज” और ललित केशवान के नाटक “हरि हिंदवाण” का मंचन किया. 1998 में गजेन्द्र नौटियाल ने “फुंडफूका” नामक रेडियो नाटक लिखा. प्रज्ञा आर्ट्स ने 2002 में दिल्ली में स्वरूप ढौंडियाल के गढ़वाली नाटक “अदालत” का मंचन लक्ष्मी रावत के निर्देशन में किया.
संक्षेप में कह सकते हैं कि अस्सी के दशक में गढ़वाली रंगमंच में आयी शिथिलता को सुरेश नौटियाल के नेतृत्व में स्थापित संस्था “द हाई हिलर्स ग्रुप” ने तोड़ा. जैसा कि कहा जा चुका है, इस रंगमंडली ने 1983 में पर्वतीय पलायन की थीम पर आधारित सुरेश नौटियाल के हिंदी नाटक “एक और आयाम” और 1986 में राजेन्द्र धस्माना के नाटक “अर्द्धग्रामेश्वर” से शुरुआत कर 2002 तक अनेक नाटक खेले.
विनोद रावत के नेतृत्व वाली संस्था “उत्तराखंड दर्शन” ने 1987 और 1989 में दिल्ली सर्वप्रथम “कौथिग” का आयोजन कर उत्तराखंडी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को वृहत्तर रूप दिया. पिछले कुछ वर्षों से “पर्वतीय सांस्कृतिक संस्था” ने “महाकौथिग” के नाम से कौथिगों की इस परंपरा को आगे बढ़ाने का काम शुरू तो किया है पर इसके परिणाम बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं हैं क्योंकि ये समारोह अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं और इस सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से नाटकों को दूर रखा गया है.
गढ़वाली थियेटर में चौथा मोड़:
गढ़वाली नाटकों का चौथा दौर सुरेश नौटियाल के नाटक फुंद्या पदान अर चखुलि प्रधान से आरंभ होता है. दि हाई हिलर्स ग्रुप ने कालिंका चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली द्वारा आयोजित “उत्तराखंड नाट्योत्सव-2015” में इसका मंचन किया. दिल्ली में लंबे समय की चुप्पी के बाद इस नाट्योत्सव का आयोजन किया गया था.
इसके पश्चात् दिल्ली में सुरेश नौटियाल और दिनेश बिजल्वाण द्वारा लिखित सबसे महत्वपूर्ण नाटक अपणु-अपणु सर्ग 3 अक्टूबर 2023 को दि हाई हिलर्स ग्रुप द्वारा दिल्ली में खेला गया. यह नाटक पर्वतीय जन-जीवन का कोलाज और भविष्य की चिंताओं का दर्पण है. दूसरे शब्दों में, यह प्रवासियों की अनंत पीड़ा का उद्वेग-चित्र भी है जो अपेक्षाकृत सीमित परिवेश में प्रस्तुत किया गया है. निःसन्देह यह पहाड़ या घर वापसी के स्पष्ट संदेश के साथ समाप्त होता है. संक्षेप में, नाटक बहुत सरल है. ‘गारे’ का बिंब पूरे नाटक को एक अलग ही धरातल पर ला खड़ा करता है. इस प्रकार यह नाटक अनेक स्तर पर गढ़वाली नाट्य परंपरा में पैराडाइम शिफ्ट की ओर इंगित करता है.

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