Krishi Chaupal

वन नेशन-वन इलेक्शन की व्यवस्था में बाधाएं

वन नेशन-वन इलेक्शन की व्यवस्था में बाधाएं

Nov 6, 2023
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बृजमोहन पंत। एक देश एक चुनाव के बारे में भारत सरकार की कार्यवाही चल रही है। सुझाव तो अच्छा है लेकिन इसको व्यवहार में लाना कठिन है। फिर भी इस बारे में विकल्प तलाशे जा रहे हैं। लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ किये जायें। साथ ही निकाय व पंचायत चुनाव भी हों। इससे समय व शक्ति की बचत होगी लेकिन इस सुझाव के कार्यान्वयन में कई कठिनाइयां हैं। इस संबंध में गठित कमेटी इस प्रस्ताव पर विचार कर रही है जिसके अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हैं।
वन नेशन-वन इलेक्शन कमेटी की बैठकें हो रही हैं। लाॅ कमीशन ने एक रोडमैप तैयार किया है जिस पर चर्चा हो रही है। लाॅ कमीशन की रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर वन नेशन-वन इलेक्शन को देश में लागू करना है तो इसके लिए कानून व संविधान में संशोधन करना पड़ेगा। फिलहाल यह संभव नहीं है। इस वर्ष के अंत तक पांच विधानसभा चुनाव होने हैं। अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होंगे। वर्ष 2024 का लोकसभा चुनाव पहले से चले आ रहे तरीके से ही होगा।
देश में एक साथ चुनाव के लिए लाॅ कमीशन की राय महत्वपूर्ण है। कई कानूनी मुद्दे हैं जिन पर चर्चा कर वन नेशन-वन इलेक्शन व्यवस्था को लागू किया जा सकता है। कानूनी बाधाओं पर विधि विशेषज्ञ राय दे रहे हैं। उल्लेखनीय है कि विधि आयोग ने केन्द्रीय कानून मंत्रालय को एक ड्राफ्ट सौंपा है जिसमें लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सार्वजनिक बचत का उल्लेख किया गया है। लोकसभा चुनाव के बाद ही व्यवस्था लागू की जा सकती है। संविधान में संशोधन के लिए लोकसभा व राज्यसभा में सत्तापक्ष को अच्छा बहुमत मिलना जरूरी है। विपक्षी दल सहमत हों तो बात बन सकती है। तब वर्ष 2029 में ही व्यवस्था लागू हो सकती है।
विधि आयोग की रिपोर्ट कहती है कि मौजूदा संविधान में यह व्यवस्था लागू करना संभव नही है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 में कतिपय प्रावधानों में संशोधन जरूरी है। विधि आयोग का कहना है कि व्यवस्था लागू होने पर प्रशासनिक व्यवस्था व सुरक्षा बलों पर बोझ कम होगा। यह इसका सकारात्मक पक्ष है।
वर्तमान व्यवस्था में लोकसभा व विधानसभा चुनावों में सुरक्षा व्यवस्था के लिए पुलिस एवं पैरामिलिट्री बलों की टुकड़ियां तैनात कर चुनावी व्यवस्था को संपन्न कराने की कार्यवाही की जाती है क्योंकि राज्य पुलिस अकेले के दम पर यह कार्य नहीं कर सकती। यदि देश में एक साथ चुनाव हुये तो सुरक्षा व्यवस्था प्रबन्ध में कठिनाई होगी। ऐसे में फोर्स की कमी को कैसे दूर किया जा सकता है? राज्य से बाहर विधानसभा चुनाव के लिए अधिकारियों व कर्मचारियों को अन्य राज्यों में भेजा जाता है। तब ऐसे में चुनाव अधिकारियों व कर्मचारियों की कमी को कैसे दूर किया जा सकता है।
चुनाव आयोग ने कहा है कि वन नेशन-वन इलेक्शन के लिए ईवीएम, वीवीपेट की संख्या बढ़ाने की जरूरत होगी। यह ईवीएम मशीनों की संभावित क्षति व पब्लिक के भरोसे के लिए भी जरूरी है। इसके लिए वीवीपेट मशीनों के निर्माण के लिए समय की आवश्यकता है। इसके लिए कम से कम एक वर्ष का समय चाहिए।
चुनाव आयोग लाॅ कमीशन के साथ विचार-विमर्श कर यह विचार व्यक्त कर चुका है कि वोटिंग मशीन के निर्माण के संबन्ध में परिवर्तनों के बारे में व्यवस्था कार्यान्वयन के लिए एक वर्ष के लीड टाइम की जरूरत होगी। चुनाव आयोग ने अतिरिक्त चार लाख वोटिंग मशीनों की जरूरत बतायी है। इनके निर्माण में समय चाहिए।
चुनाव आयोग ने व्यवस्था पर अपनी असहमति नहीं व्यक्त की है लेकिन संवैधानिक संशोधनों व ईवीएम मशीनों की उपलब्धता पर जोर दिया है। सेेमी कन्डक्टर की कमी वैश्विक समस्या है जो ईवीएम, वीवीपेट मशीनों के निर्माण में बाधक है। इसलिए वन नेशन-वन इलेक्शन की व्यवस्था के लिए अभी इंतजार करना होगा। इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना होगा।

एक साथ चुनावों से धन की होगी बचत
अगस्त 2018 में भारत के विधि आयोग द्वारा एक साथ चुनावों पर जारी मसौदा रिपोर्ट के अनुसार, एक राष्ट्र एक चुनाव के अभ्यास से सार्वजनिक धन की बचत की जा सकती है, प्रशासनिक व्यवस्था और सुरक्षा बलों पर पड़ने वाले तनाव को कम किया जा सकेगा, सरकारी नीतियों का समय पर कार्यान्वयन होगा तथा चुनाव प्रचार के बजाय विकास गतिविधियों पर ध्यान रहेगा।
संविधान के अनुच्छेद 83(2) और अनुच्छेद 172 में कहा गया है कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा, यदि इन्हें पहले भंग न किया जाए तथा अनुच्छेद 356 के तहत ऐसी परिस्थितियां भी उत्पन्न हो सकती हैं जिसमें विधानसभाएं पहले भी भंग की जा सकती हैं। इसलिए केंद्र अथवा राज्य सरकार का कार्यकाल पूरा होने से पहले सरकार गिरने की स्थिति में (ओएनओई) योजना की व्यवहार्यता सबसे अहम प्रश्न है। इस तरह के बड़े बदलाव के लिये संविधान में संशोधन करने से न केवल विभिन्न स्थितियों और प्रावधानों पर व्यापक तौर पर विचार करने की आवश्यकता होगी, बल्कि ऐसे बदलाव भविष्य में किसी प्रकार के संवैधानिक संशोधनों के लिये एक चिंताजनक मिसाल भी साबित हो सकते हैं। बार-बार होने वाले चुनावों के कारण चुनाव के वर्तमान स्वरूप को लोकतंत्र में अधिक लाभकारी के तौर पर देखा जा सकता है क्योंकि यह मतदाताओं की आवाज सुनने की अधिक बार अनुमति देता है। चूंकि राष्ट्रीय और राज्य चुनावों के अंतर्निहित मुद्दे अलग-अलग होते हैं, इसलिये वर्तमान ढांचा इन मुद्दों को पृथक रूप से हल करने में मदद करता है, जिससे अधिक जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
एक साथ चुनाव के लिये लगभग 30 लाख इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और वोटर-वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपैट) मशीनों की आवश्यकता होगी। भारतीय चुनाव आयोग ने वर्ष 2015 में सरकार को एक व्यवहार्यता रिपोर्ट सौंपी, जिसमें संविधान तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन का सुझाव दिया गया।

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