खबरों में खेती-किसानी का हिस्सा कहां!
व्योमेश चन्द्र जुगरान।
बचपन में एक गढ़वाली कविता सुनी थी- धै लगैकि धरति बोनि हे मेरा किसाना, पेट तेरो मी भोरलु करदि जा तू धाणा….।
यानी हमारी यह धरती पुकार के कह रही है कि- हे किसान, तू खेती और श्रम करता रह, भूख की चिन्ता मत कर। तेरा पेट मैं भरूंगी….। भारतीय वांग्मय में धरती को मां कहा गया है और मां अपने बच्चे को कभी भूखा नहीं सोने देती। लेकिन क्या हम इस धरती और इस पर अपने संपूर्ण श्रम के साथ अन्न उगाने वाले किसान को अपनी चिन्ताओं और प्राथमिकताओं में शामिल कर पाए हैं? सरकारें तो आजादी के बाद से ही खेती-किसानी के लिए बनाई गई अपनी अनेक योजनाओं और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से खुद को अन्नदाता की सबसे बड़ी हितैषिणी साबित करने में लगी रही हैं। चौधरी चरण सिंह और चौधरी देवीलाल जैसे किसान नेता देश की राजनीति के शीर्ष पर दिखे। लेकिन क्या हमारी किसानी ‘मदर इंडिया’ के उस सूदखोर सुख्खी लाला के कर्जजाल से निकल सकी! यह मक्कार सुख्खी बार-बार बहुरूपया बनकर हमारे सामने क्यों आ जाता है? कृषि और किसान उसके चंगुल से कभी आजाद क्यों नहीं हो पाते! आजादी के बाद के दशकों का हिसाब जोड़ें तो कर्ज में डूबे किसानों की खुदकुशी के आंकड़े चौंकाते हैं। मौजूदा मोदी सरकार जो कि इस डिजिटल दौर में किसानों को सीधे मिलने वाली आर्थिक सहायता समेत अनेक हितकारी योजनाओं का सबसे व्यावहारिक स्वरूप लेकर आई है, वह भी कर्ज के कारण किसान-मौतों को पूरी तरह नहीं रोक सकी है। माना कि इतने बड़े देश में कोई भी शासन व्यवस्था कृषि सुधारों को लागू कर खेती-किसानी का स्वर्णयुग नहीं ला सकती, मगर मीडिया या अन्य सहोदर क्षेत्र, खेती-किसानी को अपनी प्राथमिकताओं में लाकर कृषि क्षेत्र के उद्धार की दिशा तो तय कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शासन के दस सालों को खेती-किसानी के नजरिये से बेमिसाल कह देना आसान है, पर इसका सांगोपांग विश्लेषण करने का श्रम, साहस और समय कौन जुटा पा रहा है! कृषि संबंधी सकारात्मक खबरें अब भी मीडिया में हाशिए पर हैं। प्रिंट ने आज डिजिटल तक की विलक्षण यात्रा कर ली, पर खबरों की इस क्रांति में कृषि अपना हिस्सा पटाने में असमर्थ है। कई साल पहले राजेन्द्र माथुर स्मृति व्याख्यान में जाने-माने कृषि पत्रकार पी. साईनाथ के ये शब्द आज भी प्रासंगिक होकर कानों में गूंजते हैं- ”एक अखबार में दस-पंद्रह लोग मार्केट कवर कर रहे हैं, फैशन डिजानिंग और ग्लैमर संवाददाता हैं, लेकिन ग्रामीण कृषि को कवर करने वाला कोई पूर्णकालिक संवाददाता नहीं है। हम कहते हैं कि असली भारत गांवों में बसता है और 75 प्रतिशत जनता खेती-किसानी में लगी है। इसका अर्थ यह हुआ कि 75 फीसदी जनता खबर में है ही नहीं और उसके बारे में बात करने में हमारी कोई रुचि भी नहीं है। जबकि ग्रामीण भारत में खबर ढूंढ़ने की जरूरत नहीं है, वहां खबर आपको ढूंढती है।…”
सच बात है, मुख्यधारा की पत्रकारिता में गांव और खेती-किसानी को प्राथमिकता कहां मिल पाती है। हम दशकों से सुनते आ रहे हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां की अस्सी फीसदी आबादी गांव में बसती है। हमने आजादी के बाद से ही एक विकेंद्रित ग्राम स्वराज की कल्पना की, पर क्या गांवों को राजनीति के शक्ति केंद्र के रूप में पनपाने का प्रयास किया? आज भी लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों का समयावधि निश्चित है, मगर स्थानीय अथवा पंचायत चुनावों का टल जाना सामान्य सी बात है। यहां हमारी प्राथमिकता कहां चली जाती हैं? गांवों में जमीन पर निगाह गड़ाए भू-भक्षी पर्यटन और छिटपुट उद्योग के नाम पर ग्रामीणों को योजनाओं का चारा फेंकते रहते हैं, मगर सरकारों को देखें तो वे कोई बड़ा प्रोजेक्ट गांवों में लगाने का जोखिम मोल नहीं लेना चाहतीं। यहां तक कि गांवों के लिए छोटे-छोटे बिजलीघर भी गांवों में नहीं खोले जा सके।
इधर प्रधानमंत्री ने 2024 में ‘पीएम सूर्यघर मुफ्त बिजली योजना’ लॉन्च की है। इस योजना में दो किलोवाट क्षमता तक की प्रणालियों के लिए सौर इकाई की लागत का 60 प्रतिशत और दो से तीन किलोवाट क्षमता की प्रणालियों के लिए 40 प्रतिशत तक की सब्सिडी प्रदान की जाती है। सरकार का यह अभिनव प्रयोग काफी सफल साबित हो रहा है और खासकर गांवों में सौर इकाई लगाने की होड़ मची है। इसी तरह मछली पालन, तालाब, ग्रामीण सड़क, शौचालय, आवास, नल से जल और भी तमाम योजनाओं के माध्यम से गांवों को सशक्त बनाने और उन्हें देश की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य हो रहा है। किसानों के लिए तो सरकार ने सम्मान निधि से लेकर फसल बीमा, यूरिया की नीम कोटिंग, बीजों की उपलब्धता, और यहां तक कि कृषि सुधार कानून तक का सफर किया है। यह अलग बात है कि तीन कृषि कानून जो कि खेती-किसानी की तस्वीर बदल सकते थे, फैलाए गए झूठ के कारण वापस लेने पड़े और छोटे व सीमान्त किसानों के एक बहुत बड़े वर्ग को कृषि सुधारों के फायदे से वंचित होना पड़ा।
झूठ गढ़ने वाले यही लोग गेहूं और धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी चाहते हैं। यानी सरकार ही खरीदे और एमएसपी पर खरीदे। एमएसपी से कम पर खरीदी अपराध की श्रेणी में आएगी। जाहिर है, व्यापारी एमएसपी पर खरीदने से कतराएंगे और वैकल्पिक उपायों की ओर उन्मुख होंगे। सोचिए, उन हजारों छोटे किसानों पर क्या बीतेगी जो अपने उत्पादों के लिए बड़े व्यापारियों पर निर्भर हैं। सरकार की क्रय शक्ति की एक सीमा है और इसीलिए वह गेहूं और धान के साथ-साथ दलहन की खेती को प्रोत्साहन दे रही है। पर, खासकर बड़ी जोत वाले किसानों का सारा जोर गेहूं-धान पर ही है। इस बार केंद्रीय पूल से 11 राज्यों से गेहूं खरीदा गया और अब तक 283 लाख टन खरीद हो चुकी है। सरकार का वफर स्टॉक इस वक्त अपने उच्चतम स्तर 382.32 लाख टन तक पहुंच गया है।
इन दस सालों में सरकार ने खेती-किसानी में टेक्नोलॉजी के उपयोग को आसान बनाया है और देश में आज 160 से अधिक फसलें, 320 से अधिक मसाले और हजारों की संख्या में ऐसे पादप हैं जिन्हें स्थानीय लोग अपनी आजीविका के लिए उगा रहे हैं। इस तरह देखें तो भारत दुनिया का सबसे धनी जैव विविधता वाला देश है। लेकिन हमारे यहां मानव जनित समस्याओं और प्राकृतिक आपदाओं के कारण जैव विविधता पर खतरा मंडराने लगता है। इसके लिए इस सरकार ने दूसरा बड़ा जीन बैंक खोलने का निर्णय लिया है। पहले से मौजूद दिल्ली का राष्ट्रीय जीन बैंक दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बीज बैंक है जहां 4 लाख 90 हजार जर्मप्लाज्म यानी गुणसूत्र सुरक्षित हैं। दूसरा खुलने से हम अपनी जैव विविधता का अधिक मात्रा में संरक्षण कर सकेंगे।
आज भारत की चौतरफा तरक्की से दुनिया हैरान है। कोविड के असर से जहां दुनिया के अधिकांश देश अब भी नहीं संभल सके हैं, भारत ने बहुत कम समय में अपने को संभाल लिया। आज हमें टैरिफ-वार से झुकाने की कोशिशें हो रही हैं लेकिन हमने हाल में दुनिया को दिखा दिया कि हमने न सिर्फ ‘मेक इन इंडिया’ बलिक ‘मेड इन इंडिया’ में भी अपनी धाक जमाई है। हमारे पास 140 करोड़ देशवासियों का मानव संसाधन है, हम उत्पादन भी करेंगे और खपत भी। खेती-किसानी तो सिंधु घाटी की सभ्यता के समय से ही हमारे गुणसूत्र में है। तब भी हमारे पास अन्न के गोदाम थे। विश्व को कपास का पौधा हमने ही ने दिया जिसे सिंकदर की फौजों ने देखा तो दातों तले उंगली दबा ली कि भेड़ का ऊन यहां खेतों में उगता है।
हम एक सहिष्णु देश हैं। हमने सहिष्णुता के साथ-साथ निडरता का भी परिचय दिया है। हम मूलत: शांति के उपासक हैं। प्रख्यात चिंतक और संपादक श्री राजेंद्र माथुर ने लिखा था कि माओ यदि भारत में पैदा हुआ होता तो उसे झक मारकर गांधी बनना पड़ता। यह भारत की सहिष्णुता का सबसे बड़ा गुण है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो या इस्राइल-हमास, वे लगातार लड़ रहे हैं और शांति की कोई संभावना नहीं दिखती। लेकिन हमने चार रोज में ही फतह हासिल कर ली। हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि हम युद्ध नहीं बुद्ध में विश्वास करने वाले लोग हैं। लेकिन जब साहस और निडरता का परिचय देने का समय आता है तो वे दुनिया को बुद्ध की धरती (बिहार) से ही अपनी ललकार से गुंजाते हैं। यह एक काबिल नेतृत्व की सबल पहचान है।

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