Krishi Chaupal

राजस्थान-में-बढ़ती-बारिश

राजस्थान-में-बढ़ती-बारिश

Jul 25, 2025
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राजस्थान, जिसे प्राय: शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु वाला प्रदेश माना जाता है, अब जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के चलते बदलती मौसमी प्रवृत्तियों का सामना कर रहा है। परंपरागत रूप से जहां राजस्थान में औसतन कम वर्षा होती थी, वहीं हाल के वर्षों में वर्षा की मात्रा, अवधि और पैटर्न में स्पष्ट परिवर्तन देखे जा रहे हैं। खासकर मानसून के मौसम में अत्यधिक और अनियमित वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं।

  • बढ़ती बारिश के कारण

1. जलवायु परिवर्तन
– वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी के कारण वातावरण में अधिक वाष्प (भाप) बनता है, जिससे बारिश की तीव्रता और मात्रा बढ़ जाती है।
– ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से मौसम प्रणाली अस्थिर हो रही है, जिससे शुष्क क्षेत्रों में भी भारी वर्षा की घटनाएँ बढ़ रही हैं।
2. मानसून प्रणाली में बदलाव
– दक्षिण-पश्चिम मानसून की गतिविधियाँ पहले से अधिक सक्रिय हो रही हैं।
– अब मानसून राजस्थान में गहराई तक और लंबे समय तक टिक रहा है, जिससे वर्षा बढ़ गई है।
3. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की भूमिका
– इन दोनों समुद्रों से आने वाली नमी वाली हवाएँ अब अधिक तीव्र और गहरी हो गई हैं।
– राजस्थान में अब बंगाल की खाड़ी और अरब सागर दोनों की नमी पहुँचने लगी है, जिससे बारिश अधिक हो रही है।
4. पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव
– ठंड के मौसम में आने वाली पश्चिमी हवाएँ (वेस्टर्न डिस्टर्बेंस) अब गर्मियों और मानसून में भी प्रभावी हो रही हैं।
– इससे अनियमित और असामान्य बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं।
5. स्थानीय तापमान में वृद्धि
– राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों में तापमान अत्यधिक बढ़ता है, जिससे वाष्पीकरण अधिक होता है।
– वाष्पित जल वायुमंडल में जाकर बादल बनने और बारिश कराने में मदद करता है।
6. भूमि उपयोग में बदलाव
– शहरीकरण, निर्माण कार्य और वनों की कटाई से स्थानीय जलवायु प्रभावित हो रही है।
– गर्मी और ठंडी हवा के मिलने से बादल बनते हैं और वर्षा की संभावना बढ़ जाती है।
7. जलवाष्प संतुलन में असंतुलन
– वातावरण में जलवाष्प का स्तर बढ़ने से तेज बारिश की संभावना बढ़ जाती है, जो पहले राजस्थान में दुर्लभ थी।
8. वैश्विक मौसमी घटनाएँ (जैसे एल-नीनो/ला-नीना)
– ये घटनाएँ मानसून के प्रवाह को प्रभावित करती हैं, जिससे कभी-कभी राजस्थान में भी सामान्य से अधिक वर्षा हो जाती है।

  • वर्षा का बदलता स्वरूप

वर्ष औसत वर्षा (मिमी में) प्रमुख परिवर्तन
2000 350 सामान्य से कम
2010 410 थोड़ा बढ़ोतरी
2020 525 असामान्य रूप से अधिक वर्षा
2023 580+ रिकॉर्ड तोड़ वर्षा कई जिलों में
नोट: इन आंकड़ों में क्षेत्रीय विविधता हो सकती है।

  • बढ़ती बारिश के प्रभाव

    1. सकारात्मक प्रभाव:
    – जल संचयन में सुधार: झीलें, तालाब और कुएं भरने से जल संकट कम हो रहा है।
    – खेती के लिए लाभकारी: खरीफ की फसलों जैसे बाजरा, ज्वार, मक्का आदि की पैदावार में वृद्धि।
    – हरियाली में इजाफा: कुछ रेगिस्तानी इलाकों में हरियाली बढ़ रही है।
    2. नकारात्मक प्रभाव:
    – बाढ़ और जलभराव: विशेषकर शहरों में नालों का ओवरफ्लो और सड़कें जलमग्न हो रही हैं।
    – फसल क्षति: अत्यधिक बारिश से फसलों की जड़ सड़ने लगती है, जिससे नुकसान होता है।
    – मिट्टी का कटाव और भू-क्षरण: तेज बारिश से मिट्टी बहने लगती है, जिससे भूमि की उपजाऊ शक्ति घटती है।
    – मच्छरों और बीमारियों का प्रकोप: रुका हुआ पानी डेंगू, मलेरिया जैसी बीमारियों को बढ़ावा देता है।

  • प्रभावित क्षेत्र

    – जयपुर, भरतपुर, अलवर: नगरीय जलभराव की प्रमुख समस्या।
    – बाड़मेर, जैसलमेर: जहां पहले न्यूनतम वर्षा होती थी, अब अत्यधिक वर्षा से जनजीवन प्रभावित हो रहा है।
    – कोटा, झालावाड़: कृषि क्षेत्र में अत्यधिक वर्षा से सोयाबीन जैसी फसलें प्रभावित।

  • सरकार और प्रशासन की भूमिका

    – जल निकासी की व्यवस्था: शहरी क्षेत्रों में ड्रेनेज सिस्टम सुधारना आवश्यक है।
    – फसल बीमा योजना: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत किसानों को नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करनी चाहिए।
    – पूवार्नुमान और चेतावनी प्रणाली: सटीक मौसम पूवार्नुमान और चेतावनी तंत्र को मजबूत करना।

  • समाधान और सुझाव

    – वर्षा जल संचयन: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जल संरक्षण तकनीकों को बढ़ावा देना।
    – स्मार्ट कृषि अपनाना: फसल विविधिकरण, जलवायु अनुकूल बीज और सिंचाई पद्धतियों का उपयोग।
    – हरित आवरण बढ़ाना: वृक्षारोपण से जलवायु संतुलन में सहायता मिल सकती है।
    – जन जागरूकता: ग्रामीणों और किसानों को मौसम से जुड़ी जानकारी समय पर देना।


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