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आदिदेव हैं महादेव

आदिदेव हैं महादेव

Jan 4, 2024
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आर.एस. द्विवेदी।

भारत को आस्था का देश कहा जाता है लेकिन भगवान शंकर विश्व के देवता हैं। उनको आदिदेव कहा जाता है। इस साल 9 जनवरी को पहली मासिक शिवरात्रि मनायी जाएगी। सहज ही प्रसन्न होने वाले भगवान शंकर की उपासना करके हम सभी अपने जीवन को सुखमय बनाएं। सनातन धर्म में भगवान शिव की पूजा का बहुत महत्व है और हर माह मासिक शिवरात्रि मनाई जाती है। प्रत्येक महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाए जाने वाले मासिक शिवरात्रि को भगवान शिव की पूजा विधि.विधान से की जाती है। इस साल की पहली मासिक शिवरात्रि 9 जनवरी को मनाई जाएगी। भगवान के प्रति आस्था और भक्ति ही हमारे देश भारत की पहचान है। भगवान शंकर अपने विराट रूप और भक्तों पर असीम कृपा के लिए जाने जाते हैं। भक्तों की उनके प्रति गजब की आस्था है।

शिव पुराण के अनुसार महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को व्रत करने से भगवान शिव की कृपा की प्राप्ति होती है। शिवरात्रि शिव और शक्ति के मिलन का प्रतीक पर्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर भगवान शंकर की पूजा करने से वे भक्तों पर अपनी पूरी बरसाते हैं। यह भी मान्यता है कि यह व्रत शादी में आ रही परेशानियों को दूर कर देता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मासिक शिवरात्रि व्रत की पूजा चार प्रहर के दौरान की जाती है। चतुर्दशी की रात्रि को भगवान शिव का देवी पार्वती से विवाह की तिथि माना जाता है। इसलिए रात्रि की पूजा विशेष फलदायी होती है। रात में भक्त ज्यादा एकाग्रता के साथ भगवान शंकर का ध्यान और पूजा करने में सक्षम होते हैं, इसलिए आधी रात का समय शिवलिंग पूजा के लिए सबसे अच्छा समय बन जाता है। जब भी प्रदोष व्रत और मासिक शिवरात्रि व्रत एक ही दिन आने का संयोग बनता है तो इसका भक्तों को दोगुना लाभ मिलता है। इस बार 9 जनवरी को ऐसा ही अद्भुत संयोग बन रहा है। इस दिन भगवान शिव के लिए व्रतए पूजा, अभिषेक करने वालों पर भोलेनाथ की वर्ष भर कृपा बरसेगी।

भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है। जिस तरह से ब्रह्मा जी इस सृष्टि के रचनाकार हैं और विष्णु जी पालक हैं, ठीक इसी क्रम में भगवान शिव सृष्टि के संहारक हैं। उनका रहस-सहन, वेश-भूषा विचित्र है। सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदिदेव भी कहा जाता है। आदि का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था। शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है। शिव की पहली पत्नी सती ने ही अगले जन्म में पार्वती के रूप में जन्म लिया और वही उमा, उर्मि कही गई हैं।

शिव के प्रमुख 6 पुत्र हैं. गणेश, कार्तिकेय, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा। सभी के जन्म की कथा रोचक है। इसी प्रकार शिव के 7 शिष्य हैं जिन्हें प्रारंभिक सप्तऋषि माना गया है। इन ऋषियों ने ही शिव के ज्ञान को संपूर्ण धरती पर प्रचारित किया जिसके चलते भिन्न.भिन्न धर्म और संस्कृतियों की उत्पत्ति हुई। शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी। शिव के शिष्य हैं- बृहस्पति, विशालाक्ष, शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज इसके अलावा 8वें गौरशिरस मुनि भी थे। शिव के गणों में भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय प्रमुख हैं। इसके अलावा पिशाचए दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। भगवान सूर्य, गणपति, देवी, रुद्र और विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।

शिव के द्वारपाल नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल कहे जाते हैं। जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं।

शिव की वेशभूषा ऐसी है कि प्रत्येक धर्म के लोग उनमें अपने प्रतीक ढूंढ सकते हैं। मुशरिक, यजीदी, साबिईन, सुबी, इब्राहीमी धर्मों में शिव के होने की छाप स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। शिव के शिष्यों से एक ऐसी परंपरा की शुरुआत हुई, जो आगे चलकर शैव, सिद्ध, नाथ, दिगंबर और सूफी संप्रदाय में विभक्त हो गई। ऐसा माना जाता है कि शंकर ने ही बुद्ध के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने पालि ग्रंथों में वर्णित 27 बुद्धों का उल्लेख करते हुए बताया कि इनमें बुद्ध के 3 नाम अति प्राचीन हैं- तणंकर, शणंकर और मेघंकर। भगवान शिव को देवों के साथ असुर, दानव, राक्षस, पिशाच, गंधर्व, यक्ष आदि सभी पूजते हैं। वे रावण को भी वरदान देते हैं और राम को भी। उन्होंने भस्मासुर, शुक्राचार्य आदि कई असुरों को वरदान दिया था। शिव, सभी आदिवासी, वनवासी जाति, वर्ण, धर्म और समाज के सर्वोच्च देवता हैं।

इस प्रकार वनवासी से लेकर सभी साधारण व्यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्द्ध चन्द्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं, हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं। (हिफी)

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