Krishi Chaupal

अजोला : दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार

अजोला : दुधारू पशुओं के लिए पौष्टिक आहार

Sep 13, 2023
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अपनी विशेष खासियत की वजह से अजोला पशुओं के लिए एक संतुलित आहार के रूप में पाया गया है। इसमें प्रोटीन की प्रचुर मात्रा, खनिज पदार्थ एवं अमीनो अम्ल भी पाये जाते हैं। अजोला खिलाने से पशु स्वस्थ एवं निरोग रहता है और उसकी दूध देने की उत्पादकता में10-15 प्रतिशत की वृद्धि हो जाती है।

अजोला जल सतह पर मुक्त रूप से तैरने वाली जलीय फर्न है। यह छोटे-छोटे समहू में सघन हरित गुच्छे की तरह तैरती एवं फैलती है। भारत में इसकी प्रजाति अजोला पिन्नाटा एवं एनाबियाना काफी उपयुक्त पाई गई हैं। यह अधिक गर्मी सहन करने वाली किस्म है। इसकी खेती काफी वृहद रूप से चीन, वियतनाम और फिलीपाइन्स में की जाती है। दक्षिण भारत में खासकर तमिलनाडु और केरल एवं कृषि विज्ञान केन्द्र, पाली, अजमेर, जयपुर में काफी क्षेत्रों में इसका उत्पादन किया जा रहा है। अजोला कम लागत वाला पशुओं के लिए एक पौष्टिक आहार है। शुष्क भार के आधार पर इसमें 25-35 प्रतिशत प्रोटीन, 10-12 प्रतिशत खनिज पदार्थ एवं 7-10 प्रतिशत अमीनो अम्ल पाया जाता है। यह शीघ्र वृद्धि वाली किस्म है। बुवाई के पश्चात इसका उत्पादन 8-10 दिन के अन्दर प्राप्त होना शुरू हो जाता है। अजोला में ज्यादातर सभी आवश्यक अमीनो अम्ल, मेंनी प्रोवोमोरिक्स, बायो पॉलीमर्स तथा बीटा करोटीन पाये जाते हैं। इन्हीं जैव रसायनों से भरपूर होने के कारण यह पशुओं के लिये आदर्श जैविक पूरक आहार कहा जा सकता है। पशु अजोला को आसानी से पचा सकते हैं, क्योंकि इसमें रेशा तथा लिग्निन कम मात्रा में पाया जाता है। अजोला को पूरक आहार के रूप में भी प्रयोग करने पर 15-20 प्रतिशत कुल दुग्ध उत्पादन बढ़ जाता है। देश के विभिन्न प्रदेशों एवं क्षेत्रों में चारे एवं पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने के लिये अजोला उत्पादन को वृहद स्तर पर प्रोत्साहित किया जा रहा है। यह जल के स्थिर स्रोतों में प्राकृतिक रूप से भी उगाया जा रहा है।
अजोला, अजोसी कुल का एक सदस्य है जो कि मूलत: पानी में उगने वाला फर्न है। यह नम, आर्द्र एवं गर्म जलवायु में आसानी से उगाया जा सकता है। अजोला अपनी वृद्धि के लिए वायुमंडलीय नाइट्रोजन का उपयोग करता है जो कि पौधे में संरक्षित रहता है। परिणामस्वरूप प्रोटीन से भरपूर होता है। अजोला में खनिज तत्वों जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैंगनीज, जस्ता तथा तांबा आदि की मात्रा पायी जाती है। इसके अलावा इसमें विटामिन ए तथा विटामिन बी12 काफी मात्रा में पाया जाता है। साथ ही इसमें सभी आवश्यक अमीनो अम्ल पर्याप्त मात्रा में होते हैं। दुधारू पशुओं जैसे-गाय, भैंस, भेड़, बकरी आदि के आहार में सस्ते जैविक पूरक राशन के रूप में अजोला का उपयागे कर प्रोटीन तथा हरे चारे की कमी को पूरा किया जा सकता है। अजोला का चुनाव खासकर इसलिए किया गया क्योंकि यह पशुओं के लिए एक संतुलित आहार के रूप में पाया गया है। इसमें प्रोटीन की प्रचुर मात्रा, खनिज पदार्थ एवं अमीनो अम्ल भी पाया जाता है। अजोला खिलाने से न केवल पशु स्वस्थ एवं निरोग रहता है, बल्कि दूध की उत्पादकता में भी 10-15 प्रतिशत की वृद्धि पाई गई है। इसके अलावा शारीरिक विकास में भी यह काफी सहायक सिद्ध हुआ है।

अजोला उत्पादन की विधि

  • कृत्रिम रूप से अजोला के उत्पादन हेतु 15-20 सेंटीमीटर गहरे पानी के गड्ढे की आवश्यकता हेती है।
  • गड्ढे का आकार 4 मीटर लंबा, 1.5 मीटर चौड़ा तथा 20 सेंटीमीटर गहरा उपयुक्त होता है।
  • इसके बाद गड्ढे की सतह पर प्लास्टिक बिछा देते हैं ताकि आसपास लगे पेड़ों की जडें गड्ढे में न जाने पाएं। प्लास्टिक लगी होने से गड्ढे में रिसाव द्वारा बाहर का पानी नहीं पहुंचता तथा गड्ढे का तापमान भी नियंत्रित रहता है।
  • गड्ढे में प्लास्टिक कोइस प्रकार से बिछाना चाहिए जिससे उसमें परत न पड़े।
  • लगभग 10-15 किलो छनी हुई मिट्टी समान रूप से पॉलीथीन के ऊपर डाल देते हैं।
  • इसके बाद 5 किलो गोबर, 20 ग्राम अजोफर्ट या एस.एस.पी. का 10 लीटर पानी में घोल बनाते हैं और इस घोल को गड्ढे में डाल देते हैं इसके बाद और अधिक पानी को गड्ढे में डालते हैं, जिससे पानी का स्तर 8 सेंटीमीटर हो जाये।
  • लगभग 1-2 किलो ताजा, बीमारी मुक्त अजोला का बीज गड्ढे में डालते हैं।
  • अजोला 7-10 दिन में पूर्ण वृद्धि प्राप्त कर गड्ढे में भर जाता है। इस प्रकार लगभग 4 वर्ग मीटर के गड्ढे से 2 किलो अजोला प्रतिदिन प्राप्त कर सकते हैं
  • प्रत्यके 7 दिनोें के अंतराल पर गोबर 2 किलो, अजोफॉस 25 ग्राम, 20 ग्राम अजोफर्ट को 2 लीटर पानी में घोलकर गड्ढे में डालते रहना चाहिए, जिससे अजोला का उत्पादन अधिक एवं टिकाऊ बना रहता है।

अजोला की कटाई

  • अजोला 8-10 दिन में तैयार हो जाता है, जिसे प्लास्टिक की छलनी से जिसके सुराख एक सेंटीमीटर आकार के हों, उसके द्वारा निकालना चाहिए ताकि पानी गड्ढे में ही रहे।
  • आधी बाल्टी पानी में अजोला को अच्छी तरह से धो लेना चाहिए। उसके बाद ही इसका प्रयोग दुधारू पशुओं के लिए किया जाना चाहिए ताकि गोबर की गंध खत्म हो जाये फिर पशु इसे स्वाद से खाते हैं।
  • 5 गुणा 1.5 मीटर के गड्ढे से लगभग डेढ़ से दो किलो अजोला प्रतिदिन प्राप्त किया जा सकता है।
  • अजोला उत्पादन में डेढ़ से दो रुपए प्रति किलो का खर्च आता है।

अजोला के उपयोग में सावधानियां

  • पौधा परिपक्व स्थिति में न आए इसका ध्यान रखते हैं।
  • गड्ढे में जल का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से कम नहीं होना चाहिए। अधिक तापमान होने पर छप्पर या अन्य साधनों से तापमान को नियंत्रित रखना चाहिए।
  • जैव पदार्थ को प्रतिदिन या एक दिन के अंतराल पर निकाल लेना चाहिए, जिससे अजोला अधिक घना न हो। अजोला के गड्ढे में जल होना चाहिए।
  • अजोला पशुओं को देने से पहले अच्छी तरह धो लेना चाहिए, जिससे गोबर की गंध खत्म हो जाये तथा अन्य अवांछनीय गंदगी साफ कर लेनी चाहिए।
  • तीन माह के अंतराल पर अजोला की मिट्टी एवं पानी को बदल देना चाहिए। इसके उपरान्त गड्ढे में पालीथीन को निकाल कर साफ कर लेना चाहिए एवं उसमें नई मिट्टी एवं वर्मी कम्पोस्ट 10-15 किलो पुन: शीट पर समान रूप से फैलाकर फिर से गोबर का घोल और साफ अजोला डालें ताकि अजोला का उत्पादन समान रूप से मिलता रहे।
  • बीच-बीच में साफ पानी का स्तर कम होने पर अजोला के गड्ढे में पानी डालकर इसका स्तर 5-6 इंच तक बनाये रखना चाहिए।
  • अजोला गड्ढे से निकाली गई मिट्टी एवं पानी को फेंकने की बजाय अपने बागवानी एवं खेतों में डालें जिससे वह एक जैविक खाद के रूप में मिट्टी को मिलेगी एवं इसके पौष्टिक तत्व से जमीन को उपजाऊ बनाने में मदद करेंगे।
  • अजोला को पशु आहार में 10-30 प्रतिशत (उपलब्धता के आधार पर) के बीच देना चाहिए। इसे सिर्फ पूरक के रूप में उपयोग करना चाहिए।

अजोला का लाभ

  • अजोला के परीक्षण के दौरान यह पाया गया कि अजोला एक कम लागत वाली हरे चारे के रूप में पौष्टिक आहार वाली फसल है।
  • अजोला को गाय, भैंस, मुर्र्गी, सुअर, भेड़़, बकरी बड़े चाव से खाते हैं और आसानी से पचाते हैं जिसके फलस्वरूप दूध उत्पादन में 10-15 प्रतिशत वृद्धि पायी गयी है। एक माह लगातार नियमित रूप से खिलाने से बकरी, सुअर, मुर्गी के वजन में लगभग 25-30 प्रतिशत तक वृद्धि पायी गयी है।
  • अजोला का उपयोग दुधारू पशुओं के लिए करने से पशुओं को दी जाने वाली खली एवं चारे की बचत होती है।
  • इसके साथ-साथ लगभग 30-40 प्रतिशत यूिरया की बचत होती है। इसके फलस्वरूप धान की उत्पादन लागत में भी कमी आती है, जो लघु एवं सीमांत किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है।
  • अजोला की उत्पादन विधि इतनी आसान व सरल है कि इसका उत्पादन घर की महिलायें भी कर सकती हैं। पशुओं एवं छोटे जानवरों जैसे बकरी, मुर्गी, बत्तख, सुअर के लिए इसका उपयोग कर कम समय में उनका औसत वजन बढ़ाकर अच्छी आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।
  • धान के खेत में अजोला का प्रयोग एक जैविक खाद के रूप में पाया गया है, जिसके फलस्वरूप मृदा में जैविक कार्बन की वृद्धि हुई एवं मिट्टी की उवर्रता बढ़ी है। यह कृषि को दीर्घकालीन एवं शुद्ध वातावरण बनाने में सहायक सिद्ध हुआ है।

अजोला का लाभ लागत विश्लेषण
अजोला की लागत देखें तो बहुत ही कम खर्चे में अधिक मुनाफा है क्योंकि इसमें ज्यादा पैसे लगाने की जरूरत नहीं होती है। किसान अपने घर एवं प्रक्षेत्र में छायादार जगह पर इसका उत्पादन कर सकते हैं, क्योंकि इसमें सिर्फ एक क्यारी में बिछाने लायक प्लास्टिक शीट की जरूरत पड़ती है।

अजोला खिलाने से पशुओं में लाभ
अजोला संपूर्ण पोषक तत्वों का खजाना है जिससे पशुओं में सभी पोषक तत्वों की पूर्ति होती है। पशओं को नियमित अजोला खिलाने से उनके उत्पादन में वृद्धि होने के साथ-साथ उनके शरीर में भी वृद्धि होती है। वृद्धि के साथ पशु चारा व पानी संतुलित मात्रा में ग्रहण करते हैं तथा स्वस्थ रहते हैं। सबसे अधिक लाभ गाय में पाया गया है, क्योंकि गाय को संतुलित चारा नहीं खिलाने पर उसके शरीर में पोषक तत्वों की कमी होती है, जिससे वह चमड़ा, चप्पल, कपड़े और पॉलिथीन आदि खाने लगती है। सर्वे में देखा गया है कि जिस गाय को प्रतिदिन अजोला खिलाया जाता है वह इन सब चीजों को नहीं खाती है।

– विकास कुमार, मोती लाल मीणा, मधुसूदन कुण्डू एवं पुष्पा सिंह
कृषि विज्ञान केन्द्र, तुर्की, मुजफ्फरपुर, बिहार तथा डॉ. राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा

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