उत्तराखंड के पहाड़ों में मानव और बाघों के बीच संघर्ष चरम पर
बाघ के खौफ ने पहाड़ी गांवों में सहजता वाला जनजीवन छीन लिया है। शायद ही कोई दिन गुजरता हो, जब लोगों पर बाघों के हमले की खबर न आती हो। हाल में पौड़ी जिले में रिखणीखाल और धूमाकोट तहसीलों के कम से कम 26 गांवों में जिला प्रशासन को शाम सात बजे से सुबह छह बजे तक कर्फ्यू लागू करना पड़ा। बाघ ने यहां दो लोगों का शिकार कर पूरे इलाके को दहशत में झोंक दिया।
व्योमेश चन्द्र जुगरान
भारतीय वन्यजीव संरक्षण सोसायटी की रिपोर्ट के मुताबिक 2018 में उत्तराखंड में 98 गुलदार मारे गए। वन्यजीव संरक्षण के नजरिये से देखें तो यह आंकड़ा चौंकाता है, मगर यह स्थिति पहाड़ों में जंगली जानवरों और आदमी के बीच संघर्ष के चरम को भी दर्शाती है। उत्तराखंड ग्राम्य विकास और पलायन निवारण आयोग की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक पूरे उत्तराखंड में दो लाख से अधिक घरों में ताले पड़ चुके हैं और पिछले दस सालों में दो लाख आठ हजार परिवारों ने पलायन किया है। पलायन से सबसे अधिक प्रभावित जिले अल्मोड़ा और पौड़ी हैं। अकेले पौड़ी जिले में ही पिछले सात साल में करीब 186 गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं।
हालांकि पलायन के पीछे रोजगार और सड़कों का अभाव इत्यादि कारण गिनाए गए हैं, मगर यह सच है कि जंगली सूअर, बंदर, भालू और तेंदुओं के आतंक से गांवों में जीना मुहाल हुआ है। अनेक गांवों में खेती बंजर हो चुकी है। कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों से लड़कर यदि गांव में ठहरना भी चाहे तो गुलदार से कैसे लड़े! गांव आबाद थे तो छानियों में मवेशी भी थे। गांव से लगे जंगलों में जीवों का एक संसार बसता था। इनमें कई जीव गांवों में मनुष्य के होने की शर्त पर जिन्दा थे। यह सारा संतुलन मानव और जानवरों के बीच एक अनुशासन लाता था। पर अनेकानेक कारणों से अब यह सारा इको सिस्टम गड़बड़ा चुका है। बाघ अब अपने और मनुष्य के बीच रक्षा कवच के रूप में जंगल के अस्तित्व की गारंटी नहीं रह गया है बल्कि बस्तियों में आ धमका आदमखोर बन चुका है।
बाघ के खौफ ने पहाड़ी गांवों में सहजता वाला जनजीवन छीन लिया है। शायद ही कोई दिन गुजरता हो, जब लोगों पर बाघों के हमले की खबर न आती हो। हाल में पौड़ी जिले में रिखणीखाल और धूमाकोट तहसीलों के कम से कम 26 गांवों में जिला प्रशासन को शाम सात बजे से सुबह छह बजे तक कर्फ्यू लागू करना पड़ा। बाघ ने यहां दो लोगों का शिकार कर पूरे इलाके को दहशत में झोंक दिया। उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़ के मणि और भटकोट गांवों में एक माह के भीतर दो महिलाएं बाघ का निवाला बन गईं। दोनों ही घर के पास खेतों में घास काट रही थीं। वारदातों का सिलसिला थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। पौड़ी के सांसद तीरथ सिंह रावत का संसद में बयान है कि उत्तराखंड में हाल वर्षों में जंगली जानवरों के साथ संघर्ष में कम से कम 50 लोग जान गंवा चुके हैं और बाघ की दहशत के कारण खासकर जंगलों से सटे गांवों में रहना दिनों-दिन कठिन होता जा रहा है। जबकि एक गैरसरकारी रिपोर्ट कहती है कि 1 जनवरी 2000 से 24 मई 2023 तक उत्तराखंड में तेंदुओं ने 505 और टाइगर ने 69 लोगों की जान ली।
उत्तराखंड के पहाड़ों में लोग तेंदुए यानी लेपर्ड को ही बाघ के रूप में जानते आए हैं। लेकिन इधर कुछ सालों से इसका नामकरण गुलदार के रूप में किया गया और सरकारी रिकॉर्ड में यह इसी नाम से है। गुलदार की त्वचा भी बाघ के ही समान सुनहरे रंग की होती है मगर इसके शरीर पर काली धारियों की जगह काले छोटे-बड़े गोल टुबके होते हैं। इन्हीं गोल आकृतियों के कारण इसे गुलदार कहा जाता है। यह बिल्ली प्रजाति का प्राणी है और भारतीय वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के शिड्यूल-1 के अंतर्गत संरक्षित घोषित है। गुलदार बाघ से छोटा होता है, मगर फुर्ती के मामले में बाघ से कहीं तेज। यह शिकार को घात लगाकर मारने में माहिर है और शिकार को लेकर पेड़ पर भी चढ़ जाता है। जानकारों की मानें तो पहाड़ का मूल बाघ (तेंदुआ या गुलदार) कभी भी मानव जीवन के लिए खतरा नहीं रहा। वह गांवों के गोठ-गोठ्यारों से गाय, बैल, बछड़े, भेड़, बकरी और कुत्ते इत्यादि का शिकार करता था और लोग भी इसे सहजता से लेते थे। उसके स्वभाव में मनुष्यों पर हमला करना नहीं रहा। लेकिन मौजूदा गुलदार जिसे वर्णसंकर प्रजाति भी कहा जा रहा है, दिन-दहाड़े लोगों के खिलाफ हमले पर उतर आया है।
विशेषज्ञ भी मानते हैं कि गुलदार का व्यवहार लगातार बदल रहा है और उसे जंगल की बजाय बस्तियां भाने लगी हैं। संख्या अधिक होने के कारण जंगल में उनके लिए शिकार नहीं है। शहरों में उन्हें गाय, कुत्ते और सूअरों के रूप में आसान शिकार मिल जाता है। पिछले साल नवम्बर-दिसंबर में मंडलीय मुख्यालय पौड़ी के कुछ मोहल्लों में गुलदार देखे जाने से लोग अंधेरा होते ही अपने घरों में दुबकने को मजबूर हो गए। जिला प्रशासन को एडवाइजरी जारी करनी पड़ी कि मॉर्निंग वॉक हो या ईवनिंग वॉक, लोग सुनसान जगहों पर जाने से बचें और यदि जाएं भी तो झुंड में रहें।
हालांकि गुलदारों की गिनती का अलग से कोई रिकॉर्ड सामने नहीं है, अलबत्ता भारतीय वन्य जीव संस्थान देहरादून की सर्वे रिपोर्ट उत्तराखंड के पहाड़ों में गुलदारों की भारी उपस्थिति का आभास जरूर देती है। रिपोर्ट में प्रति सौ वर्ग किलोमीटर में औसतन एक दर्जन गुलदारों की मौजूदगी का अनुमान लगाया गया है। उत्तराखंड में अब तक 40 से अधिक नरभक्षी तेंदुओं को अपनी बंदूक से ढेर कर चुके पौड़ी के जाने-माने शिकारी जॉय हुकिल मानते हैं कि गुलदारों के आतंक की घटनाओं से साफ है कि उनकी तादाद लगातार बढ़ती जा रही है।
सबसे चिन्ताजनक बात यह है कि बाघ संरक्षण के आगे सरकारें किसी किस्म का समझौता करने को तैयार नहीं हैं। यहां तक कि संबंधित मामले में उन्हें अदालती आदेशों की भी परवाह नहीं है। वन्यजीवों और मानव के बीच संघर्ष के इस चरम की अनखेदी के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ता अनु पंत ने सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग करते हुए पिछले साल नैनीताल हाईकोर्ट में एक रिट याचिका दायर की। इस पर 21.11. 2022 को माननीय मुख्य न्यायाधीश विपिन सांघी और माननीय न्यायाधीश आरसी खुल्बे ने राज्य सरकार को प्रधान मुख्य वन संरक्षक की अध्यक्षता में दो सप्ताह के भीतर विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाने और इसका ब्यौरा याचिकाकर्ता को देने का आदेश दिया।
याचिकाकर्ता अनु पंत ने बताया कि सरकार ने उन्हें जानकारी देना तो दूर, अदालत तक को गुमराह किया। कमेटी यदि बनी भी तो उसमें एक्सपर्ट्स के नाम पर अपनी पसंद के ऐसे लोगों को रखा गया जिनका वाइल्ड लाइफ खासकर बाघ इत्यादि हिंसक जानवरों और उनके व्यवहार से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि सालों के तजुर्बेकार जॉय हुकिल और लखपत रावत जैसे लोगों को कोई तवज्जो नहीं दी गई। सरकार ने वर्ष 2006 से चली आ रही व्यवस्था के तहत शिकारियों के पैनल को भी खत्म कर दिया और इस कार्य के लिए वनकर्मियों को ट्रेंड करने और पुलिस बल की मदद लेने पर जोर दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि आदमखोर को मारने की विशेषज्ञता हासिल करने में सालों लग जाते हैं। यह काम इतना आसान नहीं होता कि छोटी अवधि की ट्रेंनिंग से हासिल हो जाए। वन विभाग की हालत तो यह है कि उनके पास शिकारी तो दूर, पिंजरा तक लगाने वाले अनुभवी लोग नहीं है। उन्हें इसके लिए भी विशेषज्ञ शिकारियों की मदद लेनी पड़ती है।
आखिर रास्ता क्या हो! इस सवाल पर जानकारों का मानना है कि जहां से संरक्षण की अवधारणा आई है, उन्हीं तौर-तरीकों का अनुपालन करना होगा। कुछ जिम्मेदार लोग इस मुद्दे पर एकसाथ बैठकर गंभीरता से सोचें और कुछ विकल्प निकालें। गांवों के आसपास लगभग 100 मीटर के अंदर हर खेत को आबाद करवाया जाए और जंगली झाड़ियां साफ करवाई जाएं। प्राथमिकता के आधार पर संवेदनशील गांवों में जालीदार तारबाड़ से सुरक्षा घेरा बनाया जाए। वनों के गड़बड़ाते इको सिस्टम को बहाल करने की दिशा में काम हो ताकि वन्यजीव जंगल में ही आत्मनिहित रह सकें। गुलदारों की गणना कराई जाए और उनमें बॉडी चिप/ कॉलर लगाएं जाएं ताकि मालूम हो कि वे कितने हैं और कहां-कहां हैं। साइंटिफिक डाटा सामने हो तो पता चले कि हम कितने गुलदारों को पाल सकते हैं। इसके अलावा बाघ और गुलदार में फर्क करना होगा और दोनों के लिए अलग-अलग नीति बनानी होगी। ’

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