पहाड़ की खेती की समस्याओं का समाधान है चकबंदीः गणेश सिंह गरीब
उत्तराखंड में बुद्धिजीवी और राजनीतिक पार्टियां चकबंदी की बात करती रहती हैं, लेकिन अभी तक कुछ हो नहीं पाया है। कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण ऐसा हुआ है। इस बीच राज्य में पलायन बढ़ा है, खेती घटी है और व्यवस्था चरमरा गयी है। जबकि सच्चाई यह है कि विषम भौगोलिक संरचना वाले इस राज्य में किसी भी तरह के विकास का मसला चकबंदी से ही सुलझता है। चकबंदी ही वह जड़ है जिसके सर पर विकास का पौधा पनप सकता है और फलफूल सकता है। इस संकट के बीच घुमंतू पत्रकार सुरेश नौटियाल ने गणेश सिंह गरीब के सरस्वती निवास, चंदन वाटिका, ग्राम सूला (निकट कल्जीखाल, असवालस्यूं, पौड़ी-गढ़वाल) पहुंचकर उनसे चकबंदी और संबंधित विषयों पर चर्चा की। आसान शब्दों में वह उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र की संपन्नता की कुंजी चकबंदी को मानते हैं। उनसे हुयी चर्चा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैंः
आपने चकबंदी के विचार पर कब से काम शुरू किया?
वर्ष 1975 से ही विचार था। तब मैं दिल्ली में था। खन्ना मार्किट में रेडियो बनाने और उनकी मरम्मत का अपना काम था मेरा। बहरहाल, चकबंदी के विचार को क्रियान्वित करने के लिए मैंने एक संस्था बनाई – प्रगतिशील गढ़वाली संगठन जिसका नाम बाद में अखिल भारतीय प्रगतिशील गढ़वाली संगठन कर दिया गया। स्व. हेमवतीनंदन बहुगुणा इसके संरक्षक थे। मैंने इस संस्था में चकबंदी के विचार पर चर्चा की और हमारा एक प्रतिनिधिमंडल गढ़वाल जनपद में कल्जीखाल, कोट और पौड़ी ब्लाकों के एक सप्ताह के दौरे पर गया और ग्रामीणों के साथ चर्चा की। बाद में, 1978 में मैंने अपने गांव सूला में चकबंदी पर बात रखी और चकबंदी को लेकर प्रस्ताव पारित किया। यह प्रस्ताव जनपद के डीएम को दिया गया। इस बीच मैं दिल्ली के पीतमपुरा स्थित एमआईजी फ्लैट और खन्ना मार्किट की रेडियो रिपेयरिंग एंड मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट को बंद कर गांव पहुंच गया। अपने ढाल वाले अच्छे खेत ग्रामीणों को दिए और बदले में भ्याल (खड़ी बंजर पहाड़ी) मांगी और यहीं से चकबंदी का प्रयोग शुरू किया।
आपने इस चंदनवाटिका में चकबंदी का अभिनव प्रयोग किया है। यदि आप सिंहावलोकन करें तो क्या सोचते हैं?
मैंने अपने खेत गांववालों को देकर यह ऊबड़-खाबड़ और बंजर तोक (चक) लिया और इस पर कृषि और बागवानी का प्रयोग शुरू किया। सेब, प्लम, आडू, माल्टा, अखरोट, खुबानी, अनार इत्यादि के पेड़ लगाए। इन्हें सींचने के लिए काफी दूर से पानी लाता था। सरकारी बागवानी अधिकारी भी मेरा काम देखकर चकित हो जाते थे। जैसे-जैसे पेड़ बड़े होते गए, उन्हें पानी कम देता गया क्योंकि उनकी जड़ें भूमि की नमी से पानी लेने लगी थीं। बहरहाल, जब तक शरीर में शक्ति थी प्रयोग सफल रहा पर इसका व्यापक अनुकरण अनेक कारणों से नहीं हो पाया। आज इतना ही कहूंगा कि चकबंदी आंदोलन को युवावर्ग ही आगे ले जा सकता है। बच्चों का ध्यान कृषि की ओर किया जाना आवश्यक है। कृषि-विज्ञान की पढ़ाई प्राथमिक पाठशाला से अनिवार्य हो। खेती के साथ भावनात्मक संबंध स्थापित होना भी जरूरी है।
चकबंदी को लेकर क्या आपने दूसरे राज्यों में अध्ययन किया?
हिमाचल प्रदेश सहित कुछ अन्य राज्यों में जाकर चकबंदी का अध्ययन किया। वहां से चकबंदी मैनुअल लेकर आया। चकबंदी मैनुअल वैसे तो उत्तर प्रदेश का बेहतर है पर राजनीतिक इच्छाशक्ति हिमाचल प्रदेश में बेहतर होने से परिणाम भी अधिक अनुकूल निकले हैं। एक शिकायत है कि जब उत्तर प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों में चकबंदी की गयी तब पर्वतीय भाग को क्यों छोड़ दिया गया? पहाड़ में चकबंदी तब हो गयी होती तो ऐसी दुर्दशा न होती। जहां तक याद है, पंडित गोबिंदबल्लभ पंत ने कहा था कि चकबंदी मैदानों के लिए उपयुक्त है, पहाड़ के लिए नहीं। आज की परिस्थिति को देखते हुए कहूंगा कि विकास की योजनाओं पर चकबंदी की धुरी लगानी आवश्यक है। साथ ही, मिट्टी, पानी और जवानी को खेत और गांव में रोकें।
जंगली जानवरों से खेती को बचाने के लिए चकबंदी कितनी आवश्यक है?
जंगली जानवरों से खेती को बचाने के लिए चकबंदी अत्यंत आवश्यक है। घरों में लोग रहेंगे तो जंगली जानवर भी दूर भाग जाएंगे। पहाड़ में यदि चकबंदी हो जाए तो 12 लाख लोगों का स्थाई रोजगार सुनिश्चित हो जाएगा। मैं तो इतना आशावादी हूं कि यह कह सकता हूं कि पहाड़ में 90 प्रतिशत समस्याओं का समाधान चकबंदी में है।
क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी के कारण चकबंदी पर क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा है?
हां, इस काम में राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। पर्वतीय विकास कैसा हो, इस बारे में गंभीरता भी नहीं है। यह बात अब तक की सब सरकारों पर लागू होती है। हमने पहाड़ी राज्य लिया, पर्वतीय भूमि के नियोजन का दायित्व लिया पर भूमि प्रबंधन नहीं कर पाए, जबकि यह पहला काम होना चाहिए था। विकास की जो भी योजनाएं रहीं, उनका परिणाम विनाशकारी रहा। पलायन भी तेज हुआ है और वाह्य-निर्भरता बढ़ गयी है। इससे अधिक दुखद क्या होगा कि राज्य बनने के बाद खेत बंजर होने की गति बढ़ी है। सरकारें बस सस्ती लोकप्रियता पाने की होड़ में रहती हैं। कुल मिलाकर सोच में गड़बड़ है, इसे दुरुस्त करने की जरूरत है।
पहाड़ में खेती की बुरी स्थिति है पर दावेदारों की कमी भी नहीं है। ऐसे में आप एक अच्छी स्थिति की परिकल्पना कैसे करते हैं?
मैं कुल मिलाकर चिंतित हूं। पर, मन में है कि ऐसा कानून बने जो सुनिश्चित करे कि खेती सर्वप्रथम उसकी हो जो स्थाई रूप से उसे जोतता हो, दूसरे उसकी हो जो जोतता तो न हो और किसी कारणवश पलायन कर गया हो पर लौटकर खेती करने की इच्छा रखता हो। तीसरा अधिकार उसका बनता है जो अपने गांव और खेत से संबंध बनाए रखना चाहता हो, पर जो दशकों पहले पलायन कर गया हो और देश की आजादी के समय से ही नदारद हो, उसकी भूमि का निर्णय ग्राम-समाज के पक्ष में, बड़े हित में किये जाने की व्यवस्था हो।
उत्तराखंड को संविधान के अनुच्छेद-371 के अंतर्गत लाए जाने की मांग उठती रहती है। आपकी इस बारे में क्या राय है? राजस्व अधिनियम की बात भी चल रही है!
संविधान के अनुच्छेद-371 की व्यवस्थाओं के बारे में पूरी जानकारी नहीं है। पर, इतना अवश्य है कि गांव की भूमि गांव के मूल निवासियों के पास ही रहनी चाहिए। उत्तराखंड में हिमाचल प्रदेश की शैली में भूमि-सुधार किया जाना चाहिए। राजस्व अधिनियम तो होना ही चाहिए ताकि खेती की जमीनों की खरीद-फरोख्त को प्रतिबंधित किया जा सके।
फोटोः अनीता नौटियाल

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