‘हरित क्रांति’ के जनक एम. एस. स्वामीनाथन को ‘भारत-रत्न’
महेन्द्र बोरा।
‘भारत-रत्न’ देश सेवा में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्ति को दिया जाने वाला सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। वर्ष 2024 के लिए अभी पांच महान विभूतियों को इस सम्मान से नवाजा गया- कर्पूरी ठाकुर, चैधरी चरण सिंह, पी.वी. नरसिम्हा राव, एम.एस. स्वामीनाथन और लालकृष्ण आडवाणी। स्वामीनाथन को यह पुरस्कार कृषिक्षेत्र में उनके विशेष योगदान के लिए दिया गया। देश को भुखमरी से आत्मनिर्भरता तक पहुंचाने वाली ‘हरित-क्रांति’ का दारोमदार स्वामीनाथन के कंधों पर ही था। इसीलिए उन्हें ‘हरित क्रांति का जनक’ कहा जाता है।
एम.एस. स्वामीनाथन का जन्म 7 अगस्त 1925 को तमिलनाडु के कुंभकोणम् में हुआ था। तब इसे मद्रास प्रेसिडेंसी कहा जाता था। स्वामीनाथन का पूरा नाम मनकोम्बु संबासिवन स्वामिनाथन था। उनके पिता का नाम एम.के. संबासिवन था और वे एक सर्जन थे। जब स्वामीनाथन मात्र 11 साल के ही थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गयी थी। इसलिए उनकी पढ़ाई-लिखाई उनके बड़े भाई ने की। परिवार के लोग उन्हें भी डाॅक्टर बनाना चाहते थे लेकिन कुदरत को कुछ और ही मंजूर था। 1960 और 70 के दशक में भारतीय कृषि में स्वामीनाथन ने जो काम किया उससे वे अमर हो गये। उन्हें ‘हरित क्रांति का जनक’ कहा गया। खाद्यान्न में आज भारत की जो आत्मनिर्भरता है उसमें स्वामीनाथन का अतुलनीय योगदान है।
समाज सेवा और देश सेवा के संस्कार स्वामीनाथन को बचपन से मिले थे। उनके पिता ने स्वदेशी आंदोलन और तमिलनाडु में मंदिर प्रवेश आंदोलन में भाग लिया था। इससे स्वामीनाथन के मन में छोटी उम्र में ही सेवा का विचार आ गया।
अपने पैतृक शहर के एक स्थानीय स्कूल से मैट्रिक करने के बाद उन्होंने मद्रास कृषि काॅलेज में दाखिला लिया और कृषि विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद वह पादप प्रजनन और आनुवंशिकी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के लिए नई दिल्ली में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा चले आये। इसके बाद वह आलू आनुवंशिकी पर शोध करने के लिए यूनेस्को की फेलोशिप पर नीदरलैंड के वैगनिंगेन कृषि विश्वविद्यालय चले गये।
इसके बाद 1952 में उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी स्कूल आफ एग्रीकल्चर से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद वह एक शोधकर्ता के रूप में विस्काॅन्सिन विश्वविद्यालय चले गए। विदेशों से कृषि विज्ञान का अपार ज्ञान अर्जित करने के बाद वह वर्ष 1954 में भारत लौट आये और भारतीय कृषि की दशा-दिशा बदलने के लिए खुद को समर्पित कर दिया।
वह 1960-70 का दौर था जब भारतीय कृषि बुरी स्थिति में थी। देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी और उसकी तुलना में कृषि उत्पादन नहीं हो पाता था। कृषि व्यवस्था पूरी तरह परंपरागत खेती पद्धति पर आधरित थी जिसके बल पर विशाल जनसंख्या का पेट भर पाना बेहद कठिन था। यह बहुत चुनौतीपूर्ण कार्य था कि बड़ी आबादी के लिए कम से कम दो वक्त भोजन की व्यवस्था हो सके। यह जिम्मेदारी स्वामीनाथन को दी गयी और उन्होंने अपनी प्रखर मेधा के बल पर केवल एक दशक में ही देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया। खाद्यान्न में यही आत्मनिर्भता ‘हरित-क्रांति’ यानी ‘ग्रीन रिवाॅल्यूशन’ कहलायी। चूंकि इसमें स्वामीनाथन का विशेष योगदान था इसलिए उन्हें ‘हरित-क्रांति का जनक’ यानी ‘फादर आफ ग्रीन रिवाॅल्यूशन’ कहा गया।
28 सितंबर 2023 को इस महान कृषि विज्ञानी एम.एस. स्वामीनाथन का 98 साल की उम्र में निधन हो गया। वह उम्र के अंतिम पड़ाव तक खेती की उन्नति के लिए काम करते रहे। 9 पफरवरी 2024 को उन्हें भारत के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।

नोबेल पुरस्कार विजेता नाॅर्मन अर्नेस्ट बोरलाॅग (दाएं) के साथ एम.एस. स्वामीनाथन
स्वामीनाथन के प्रमुख कार्य
- हमारे यहां परंपरागत वसंत गेहूं की तुलना में विदेशी किस्म नोरिन-10 के बौने जीन को शामिल करने वाली उच्च उपज वाली किस्में सोनारा-63, सोनोरा-64, मेयो-64 और लेर्मा रोजो-64ए भारत में खेती के लिए बेहतर अनुकूल थीं।
- स्वामीनाथन से पत्राचार के बाद नार्मन बोरलाॅग मार्च 1963 में भारत पहुंचे और उत्तर भारत के प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्रों का दौरा करने के बाद अक्टूबर 1963 में चार मैक्सिकन किस्मों के लगभग 100 किलो बीज भेजे। इन्हें 1963-64 के रबी सीजन में चार परीक्षण क्षेत्रों में बोया गया- पंतनगर (उत्तराखंड) और कानपुर (उत्तर प्रदेश), लुधियाना (पंजाब) और पूसा (बिहार)।
- नवंबर 1964 में दिल्ली के जौंती गांव के किसानों ने सोनोरा-64 और लेरमा रोजो-64ए गेहूं लगाया और हरित क्रांति की शुरुआत हुई। ‘हरित-क्रांति’ की शुरुआत 1965-68 के दौरान हुई थी।
- इस क्रांति के दौरान भारतीय कृषि में आधुनिक तरीकों और टेक्नोलाॅजी को अपनाया जाने लगा था। इसमें ज्यादा उपज देने वाली विदेशी किस्में, ट्रैक्टर, सिंचाई की अत्याधुनिक सुविधाएं, कीटनाशक और उर्वरक जैसे प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया जाने लगा।
- स्वामीनाथन ने ‘हरित-क्रांति’ की सपफलता के लिए दो केंद्रीय कृषि मंत्रियों सी. सुब्रमण्यम और बाबू जगजीवन राम के साथ मिलकर काम किया।
- 60 के दशक में भारत को अकाल से बचाने के लिए स्वामीनाथन और उनके अमेरिकी वैज्ञानिक साथी नाॅर्मन बोरलाॅग को श्रेय जाता है।
स्वामीनाथन द्वारा सुशोभित पद
- 1972 और 1979 के बीच स्वामीनाथन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक थे। वहां रहते हुए उन्होंने भारत के राष्ट्रीय पादप, पशु और मछली आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो का गठन किया।
- उन्होंने भारतीय वन सर्वेक्षण (एफएसआई) के परिवर्तन में भी भूमिका निभाई।
- 1979 में उन्हें भारत सरकार के कृषि मंत्रालय का प्रधान सचिव नियुक्त किया गया।
- 1981 से 85 तक वह खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) के स्वतंत्र अध्यक्ष थे।
- 1984 से 90 तक वह आईयूसीएन (प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ) के अध्यक्ष थे।
- 1988-96 तक वह वल्र्डवाइड फंड फाॅर नेचर-इंडिया के अध्यक्ष थे।
- 1999 में टाइम पत्रिका ने केवल तीन भारतीयों को 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली एशियन्स की लिस्ट में रखा था- रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी और एम.एस. स्वामीनाथन।
- 2001 में वह सुंदरबन विश्व धरोहर स्थल में जैव विविधता प्रबंधन पर भारत-बांग्लादेश संयुक्त परियोजना के क्षेत्रीय संचालन समिति के अध्यक्ष थे।
- भारत में किसानों की आत्महत्या के गंभीर मुद्दे के समाधान के लिए सरकार ने 2004 में राष्ट्रीय किसान आयोग (एनसीएफ) का गठन किया जिसका अध्यक्ष स्वामीनाथन को बनाया गया।
- वह वल्र्ड एकेडमी आफ साइंसेज के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं।
स्वामीनाथन द्वारा स्थापित संस्थाएं
- एम.एस स्वामीनाथन ने बायोस्फीयर रिजर्व के ट्रस्टीशिप प्रबंधन की अवधारणा शुरू की। उन्होंने मन्नार की खाड़ी बायोस्फीयर रिजर्व ट्रस्ट को क्रियान्वित किया।
- 1990 के दशक में अवलंबनीय कृषि तथा ग्रामीण विकास के लिए चेन्नई में एक शोध केंद्र की स्थापना की।
- उन्होंने एम.एस. स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन की स्थापना की। यह एक गैर सरकारी संगठन है और विशेष रूप से ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए काम करता है।
स्वामीनाथन को मिले पुरस्कार
- लंदन की राॅयल सोसायटी सहित विश्व की 14 प्रमुख विज्ञान परिषदों ने एम. एस. स्वामीनाथन को अपना मानद सदस्य बनाया।
- 1971 में सामुदायिक नेतृत्व के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार।
- 1987 में पहला विश्व खाद्य पुरस्कार।
- 1991 में अमेरिका में टाइलर पुरस्कार।
- 1994 में पर्यावरण तकनीक के लिए जापान का होंडा पुरस्कार।
- कई अनगिनत अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार।
- भारत सरकार द्वारा पद्मश्री (1967), पद्मभूषण (1972), पद्मविभूषण (1989) और भारत-रत्न (2024)।
यह बेहद खुशी की बात है कि भारत सरकार कृषि और किसानों के कल्याण में हमारे देश में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए डाॅ. एम.एस. स्वामीनाथन जी को भारत रत्न से सम्मानित कर रही है। उन्होंने चुनौतीपूर्ण समय के दौरान भारत को कृषि में आत्मनिर्भरता हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय कृषि को आधुनिक बनाने की दिशा में उत्कृष्ट प्रयास किए। हम एक अन्वेषक और संरक्षक के रूप में और कई छात्रों के बीच सीखने और अनुसंधान को प्रोत्साहित करने वाले उनके अमूल्य काम को भी पहचानते हैं। डाॅ. स्वामीनाथन के दूरदर्शी नेतृत्व ने न केवल भारतीय कृषि को बदल दिया है बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और समृद्धि भी सुनिश्चित की है। वह ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें मैं करीब से जानता था और मैंने हमेशा उनकी अंतर्दृष्टि और इनपुट को महत्व दिया है।
– प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
चिदंबरम सुब्रमण्यम : हरित क्रांति के राजनीतिक वास्तुकार
30 जनवरी 1910 को तमिलनाडु के जनपद कोयम्बटूर के पोल्लाची के पास एक छोटे से गांव सेनगुत्तिपलायम में जन्मे चिदंबरम सुब्रमण्यम (सीएस) ने प्रेसीडेंसी काॅलेज से भौतिकी में बीएससी और मद्रास लाॅ काॅलेज से कानून की डिग्री हासिल की। वह एक ऐसे राजनेता थे जिन्होंने राज्य सरकार और केंद्र सरकार में मंत्री पद संभाला और बाद में महाराष्ट्र के गवर्नर भी रहे।
लोकसभा में उनका चुनाव पहली बार 1962 में हुआ। उन्हें तब इस्पात और खनन मंत्रालय की बागडोर सौंपी गई। उसके बाद लाल बहादुर शास्त्री के मंत्रालय में वह कृषि मंत्री बने। वह भारत में हरित क्रांति के राजनीतिक वास्तुकार रहे। बाद में वह रक्षा और वाणिज्य मंत्री बने। वह पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी और चैधरी चरण सिंह के साथ मंत्री पद पर काम करने वाले एकमात्र व्यक्ति हैं। केंद्रिय मंत्री बनने से पहले वह तत्कालीन मद्रास राज्य में सी. राजगोपालाचारी और कुमारस्वामी कामराज के नेतृत्व वाले मंत्रिमंडल में शिक्षा, कानून और वित्त मंत्री बने। वह 1990-1993 के बीच महाराष्ट्र के गवर्नर रहे।
उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उन्होंने गांधीजी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होने का पफैसला किया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्हें जेल भी हुई थी। स्वतंत्र भारत में वह संविधान सभा के सदस्य बने और संविधान के निर्माण में भाग लिया।
9 जून 1964 से 11 जनवरी 1966 तक चली लाल बहादुर शास्त्री की सरकार में सी. सुब्रमण्यम ने कृषि विभाग संभाला था। यह वह दौर था जब देश अनाज की किल्लत से जूझ रहा था। लगभग भुखमरी की स्थिति थी। कई राज्य सूखाग्रस्त थे, कई जगहों में अकाल पड़ा हुआ था। दूसरी तरपफ दिनोंदिन जनसंख्या बढ़ रही थी। तब बतौर कृषि मंत्री सी. सुब्रमण्यम ने एक बड़ा पफैसला लिया और इसके लिए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को भी राजी कर लिया। उन्होंने अपने दिल्ली स्थित घर के बगीचे को खोदने का आदेश दे दिया। उसकी जगह वह गेहूं के बीज बोने जा रहे थे। यह कोई साधारण बीज नहीं था, बल्कि सुप्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक नाॅर्मन बोरलाॅग द्वारा विकसित गेहूं की मैक्सिकन किस्म थी। यह गेहूं की उच्च उपज देने वाली रोग-प्रतिरोधी और अर्ध-बौनी किस्म थी।
सी. सुब्रमण्यम के लिए शुरुआत में यह कठिन पफैसला था क्योंकि उन्हें लोकप्रिय नेता कहा जाता था। तब किसी को भी इस अनजान गेहूं के बीज पर भरोसा नहीं था। राजनीतिक नेताओं से लेकर किसानों और तमाम अन्य यूनियनों तक किसी को भी नहीं। बौने जीन से विकसित किया गया गेहूं का यह बीज भारत में क्या गुल खिलाएगा यह बिल्कुल अस्पष्ट था, लेकिन सी. सुब्रमण्यम को अपने पफैसले पर पूरा भरोसा था कि यह भारत के खाद्य संकट को हल करेगा।
जब तय हो गया कि मैक्सिकन गेहूं को भारत में उगाना है तो इस काम में लगाये गये तब के बेहद चर्चित कृषि वैज्ञानिक एम.एस. स्वामीनाथन। स्वामीनाथन ने इस किस्म की प्रजनन सामग्री प्राप्त करने के लिए नाॅर्मन बोरलाॅग को ट्रैक किया। यह उस दिशा में पहला कदम था जिसे बाद में हरित क्रांति कहा गया।
गेहूं की इस किस्म ने भारत में पैदावार को कई गुना बढ़ा दिया तो बाद में धान में भी यह प्रयोग किये गये और वर्ष 1972 तक मात्र आठ सालों में देश ने खाद्यान्न उत्पादन में लगभग भुखमरी की स्थिति से आत्मनिर्भरता हासिल कर ली। इसी दौर को हरित क्रांति कहा जाता है। इस प्रकार हरित क्रांति का श्रेय सी. सुब्रमण्यम और एम.एस. स्वामीनाथन दोनों को बराबर जाता है। सी. सुब्रमण्यम ने तमाम विरोध के बाद राजनीतिक जिम्मेदारी संभाली तो स्वामीनाथन ने मजबूती से तकनीकी पक्ष संभाला।
7 नवंबर 2000 को 90 वर्ष की आयु में इस महान राजनीतिज्ञ सीएस का निधन हो गया। आज सीएस को भारत की हरित क्रांति के राजनीतिक वास्तुकार के रूप में याद किया जाता है। भारत सरकार ने वर्ष 1998 में उन्हें देश के सर्वोच्च अलंकरण ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया।



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