जन्म-मरण के बंधन से मुक्त करता महाकुंभ
पं. आर. एस. द्विवेदी।
पौराणिक मान्यता है कि महाकुंभ मेले में स्नान से व्यक्ति को जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है अर्थात् उसे मोक्ष प्राप्त हो जाता है। स्नान करने वाले के सभी सांसारिक पाप और क्लेश कट जाते हैं। प्रयागराज के संगम में आगामी 13 जनवरी पौष पूर्णिमा से महाकुंभ मेला प्रारम्भ होगा। यह मेला 26 फरवरी महाशिवरात्रि तक चलेगा। प्रयागराज में महाकुंभ मेला लगता है जबकि हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में अर्धकुंभ मेला आयोजित होता है। महाकुंभ मेला हिन्दू धर्म में आस्था रखने वालों के लिए एक पवित्र अवसर होता है, जब लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती संगम में स्नान के लिए देश-विदेश से इक्टठा होते हैं।
लगभग एक महीने तक चलने वाले आस्था के इस महापर्व के दौरान कई महत्वपूर्ण पर्व भी आते हैं जिन तिथियों पर स्नान करने का विशेष महत्व होता है। सबसे पहला है। 13 जनवरी को पौष पूर्णिमा स्नान। मान्यता है कि पौष पूर्णिमा के दिन कुंभ स्नान करने से व्यक्ति के सारे पाप धुल जाते हैं। माना जाता है कि इस दिन गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और पुण्य की प्राप्ति होती है। यह दिन मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी उपयुक्त माना जाता है। अगले दिन 14 जनवरी को मकर संक्रांति होगी। इस दिन सूर्य देव धनु राशि ले निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसी अवसर को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मान्यतानुसार इस दिन स्नान, दान, जप, धार्मिक अनुष्ठान करने का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि इस दिन किया गया दान पुण्य आपके पुनर्जन्म पर सौ गुणा के बराबर फल देता है। इस दिन तिल से स्नान करने, तिल खाने, तिल का दान करने और हवन करना शुभ फलदायी होता है।
29 जनवरी को होगी मौनी अमावस्या। मौनी अमावस्या माघ मास की सबसे बड़ा स्नान पर्व है। मौनी अमावस्या का स्नान अन्य सभी स्नानों में सर्वोत्तम माना जाता है। आपको बता दें कि इस दिन पुण्यकाल पर स्वयं का उद्धार तथा पितरों को तारने के लिए दान, पुण्य, स्नान करना फल दायी होता है। इस स्नान का वर्णन शास्त्रों में भी मिलता है। ऐसे में आप इस तिथि में कुंभ स्नान करके पुण्य फल की प्राप्ति कर सकते हैं। इसके बाद 03 फरवरी को बसंत पंचमी है।
बसंत पंचमी को कुंभ स्नान करने और उनके नाम से दान पुण्य करना बहुत अच्छा माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन दान आदि करने से आपकी जिह्वा पर देवी सरस्वती वास करती हैं। तत्पश्चात् 12 फरवरी को माघ पूर्णिमा होगी।
माघ पूर्णिमा कुंभ मेले का अंतिम और महत्वपूर्ण स्नान तिथि होती है। इस दिन स्नान ध्यान करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं साथ ही मोक्ष की भी प्राप्त होती है। हालांकि महाकुंभ का समापन 26 फरवरी महाशिवरात्रि को होगा। महाशिवरात्रि पर महाकुंभ मेले का समापन होगा। इस दिन शिव-पार्वती का स्मरण कर स्नान, ध्यान, पूजन, उपासना, व्रत करने से आप भोलेनाथ और माता पर्वती का आप पर सदैव आशीर्वाद बना रहता है। यह व्रत करने से आत्मिक शांति मिलती है। कुंभ मेला भारत में आयोजित होने वाला एक विश्वप्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक महोत्सव है। यह मेला हर 12 साल में एक बार चार प्रमुख तीर्थ स्थलों- प्रयागराज (पूर्व में इलाहाबाद), हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है, जहां देश-विदेश से हिन्दू धर्म में आस्था रखने वाले लाखों श्रद्धालु पवित्र नदी में स्नान करते हैं और सुख शांति की कामना करते हैं। इस बार महाकुंभ मेला 13 जनवरी से प्रयागराज में आयोजित किया जा रहा है, जो 26 फरवरी को महाशिवरात्रि के दिन समाप्त होगा। कुंभ मेले के आयोजन स्थल को लेकर कुछ लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर यह इन्हीं 4 शहरों में ही क्यों लगता है? इसके पीछे एक पौराणिक कथा है। कुंभ मेला सागर मंथन से जुड़ा हुआ है। पुराणों के अनुसार, जब देवताओं और दानवों ने मिलकर सागर मंथन किया, तो अमृत कलश (कुंभ) प्रकट हुआ, जिसको लेकर देवता और दैत्यों के बीच युद्ध शुरू हो गया। इस युद्ध के दौरान अमृत कलश को देवताओं ने अपने कब्जे में ले लिया। इस दौरान अमृत कलश की कुछ बूंदें पृथ्वी के चार स्थानों पर गिरी थीं वो है प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक। यही कारण है ये चार स्थान कुंभ मेला के आयोजन स्थल बने और यहां श्रद्धालु पवित्र स्नान करने आते हैं ताकि वे अपने पापों से मुक्ति प्राप्त कर सकें और पुण्य कमा सकें।
महाकुंभ मेला भारतीय धार्मिक परंपरा और आस्था का प्रतीक है, जिसमें विशेष रूप से स्नान की महिमा का वर्णन किया जाता है। कहा जाता है कि जब भक्त पवित्र नदियों (गंगा, यमुना, गोदावरी और शिप्रा) में स्नान करते हैं, तो वे न केवल शारीरिक रूप से शुद्ध होते हैं, बल्कि मानसिक और आत्मिक शुद्धि भी प्राप्त करते हैं। यूनेस्को ने कुंभ मेला को 2017 में अपनी मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर की सूची में शामिल किया। यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने से कुंभ मेला का महत्व और भी बढ़ गया है और यह सुनिश्चित करता है कि यह अद्भुत धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रहेगी।
यहां पर आयोजित होने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम, साधुओं और संतों के प्रवचन, और परंपरागत रीति-रिवाज भारतीय संस्कृति की जड़ें मजबूत करते हैं। इसलिए, कुंभ मेला न केवल एक धार्मिक आयोजन है, बल्कि यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी है, जिसे यूनेस्को जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन ने पहचान दी है।
सनातन धर्म में गंगा, यमुना और सरस्वती समेत कई नदियों को मां का दर्जा दिया गया है। इसीलिए सनातन धर्म का सबसे बड़ा समागम कुंभ मेले के तौर पर मनाया जाता है। महाकुंभ मेला 12 सालों में एक बार आयोजित किया जाता है। इस बार महाकुंभ मेला 2025 में प्रयागराज में आयोजित किया जा रहा है। महाकुंभ मेले के दौरान तीन पवित्र नदियों के संगम तट पर स्नान के लिए देश और विदेश से करोड़ों लोग आते हैं। इस दौरान प्रयागराज में संगम का पवित्र तट सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के साथ-साथ आध्यात्मिकता और परंपरा का अद्भुत संगम बन जाता है। इससे पहले महाकुंभ मेला 2013 में प्रयागराज में लगा था। महाकुंभ मेले के लिए बड़े स्तर पर महीनों पहले से ही तैयारियां शुरु हो जाती हैं।
हर बारह साल में जब बृहस्पति देव यानी गुरु ग्रह वृषभ राशि में स्थापित हो और सूर्य ग्रह मकर राशि में हों तब कुंभ मेला आरंभ होता है। अगले साल 13 जनवरी को सूर्य मकर राशि में गोचर करने वाले हैं जबकि बृहस्पति पहले से ही वृषभ राशि में मौजूद हैं। ऐसे में महाकुंभ मेले के योग बन रहे हैं और इसलिए 14 जनवरी से महाकुंभ मेला आरंभ हो रहा है। आपको बता दें कि ग्रहों की विशेष युति से ही कुंभ और अर्धकुंभ मेले के योग बनते हैं। महाकुंभ की तरह जब सूर्य ग्रह और बृहस्पति ग्रह दोनों ही ग्रह सिंह राशि में गोचर करते हैं तो अर्धकुंभ मेला महाराष्ट्र के नासिक में आयोजित होता है। इसके अलावा जब सूर्य मेष राशि और बृहस्पति कुंभ राशि में गोचर करते हैं तो कुंभ मेले का आयोजन हरिद्वार में किया जाता है। उज्जैन में कुंभ मेला तब आयोजित होता है जब बृहस्पति देव सिंह राशि में और सूर्यदेव मेष राशि में विराजमान होते हैं। इस तरह अर्द्धकुंभ और महाकुंभ आयोजित होते रहते हैं।

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