Krishi Chaupal

मणिपुर: हुजूर आते आते बहुत देर कर दी

मणिपुर: हुजूर आते आते बहुत देर कर दी

Feb 27, 2024
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मनोज कुमार अग्रवाल। उच्च न्यायालय के एक फैसले से उपजे तनाव के बाद मणिपुर में हिंसा का दौर शुरू हुआ था। अब मीलार्ड ने अपना फैसला पलट दिया है लेकिन क्या दो समुदायों के बीच पैदा तनाव हिंसा और अविश्वास को आसानी से नियंत्रित किया जा सकेगा? इसमें सन्देह है। आपको बता दें कि मणिपुर में जातीय हिंसा के मूल में सबसे बड़ा कारण 27 मार्च, 2023 को न्यायालय का वह फैसला है, जिसमें मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने का निर्देश दिया गया था। इसी के बाद तीन मई, 2023 से मैतेई और कुकी समुदाय के बीच हिंसा भड़की, जो आज तक जारी है। इसमें अब तक दो सौ से अधिक लोगों की जान चली गई है और 1100 से अधिक लोग घायल हुए हैं। पथराव और आगजनी से भी लोगों को काफी क्षति उठानी पड़ी है। सरकारी सम्पत्ति की भी क्षति हुई है। अब मणिपुर उच्च न्यायालय ने 21 फरवरी 2024 को इस सन्दर्भ में जो बड़ा फैसला सुनाया है, वह अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। फैसले में न्यायमूर्ति गोतामेई गैफुलशिलु की पीठ ने आदेश जारी कर उस विवादित भाग को हटा दिया है, जिसमें मैतेई को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति गैफुलशिलु का यह भी कहना है कि न्यायालय ने जो पहले फैसला दिया था, वह सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के रुख के खिलाफ था। उच्च न्यायालय में इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका लगायी गयी थी, जिसपर 21 फरवरी को सुनवाई हुई। पीठ ने अनुसूचित जनजाति सूची में संशोधन के लिए भारत सरकार की प्रक्रिया की ओर संकेत करते हुए विवादित निर्देश को हटाने की जरूरत बतायी। 27 मार्च, 2023 के फैसले में कहा गया था कि राज्य सरकार आदेश मिलने के चार सप्ताह के अन्दर मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करने के मामले में तेजी लाये। वैसे मणिपुर उच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है, वह उचित और न्यायसंगत है। इससे जातीय कटुता में कमी आयेगी ।

गौरतलब है कि मणिपुर की कुल आबादी लगभग 37 लाख है। इसमें मैतेई 53 प्रतिशत और कुकी 40 प्रतिशत हैं। मैतेई ज्यादातर इम्फाल घाटी में रहते हैं और नगा-कुकी पहाड़ी जिलों के निवासी है। मणिपुर में कुल 16 जिले हैं इनमें पांच जिले हिंसा से अधिक प्रभावित हैं। मैतेई ज्यादातर हिन्दू हैं जबकि नगा-कुकी ईसाई धर्म को मानते हैं। राज्य के करीब दस प्रतिशत क्षेत्र में फैली इम्फाल घाटी मैतेई समुदाय बहुल है। राज्य की 60 में से 40 विधानसभा सीटों पर मैतेई का कब्जा है और राज्य के मुख्यमंत्री भी मैतेई हैं। 20 विधायक नगा-कुकी जनजाति से हैं। ऐसी स्थिति में जातीय विषमता है। इसलिए इसे दूर करने की दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है। उच्च न्यायालय का फैसला किस सीमा तक राज्य में शान्ति बहाली में सहायक होगा, यह अभी अनिश्चित है फिर भी फैसले का सार्थक प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

हालांकि मणिपुर में चल रही जातीय हिंसा का सिलसिला जारी है। मणिपुर में 3 मई 2023 से रह-रहकर हो रही हिंसा के बीच अब मणिपुर उच्च न्यायालय ने बुधवार 21 फरवरी 2024 को अपना ही आदेश पलट दिया। उच्च न्यायालय ने मणिपुर सरकार को पिछले साल दिए गए अपने निर्देश को वापस ले लिया है। दरअसल, मैतेई समुदाय को एसटी सूची में शामिल नहीं करने वाले उच्च न्यायालय के निर्देश के कारण मई 2023 में राज्य में दंगे भड़क उठे थे। मणिपुर उच्च न्यायालय ने मार्च 2023 में दिए गए फैसले के उस पैरा को हटाने का आदेश दिया है जिसमें राज्य सरकार से मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची में शामिल करने पर विचार करने को कहा गया था। अदालत ने कहा कि यह पैरा उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ द्वारा इस मामले में रखे गए रुख के विपरीत है। उच्च न्यायालय द्वारा 27 मार्च, 2023 को दिए गए निर्देश को राज्य में जातीय संघर्ष के लिए उत्प्रेरक माना जाता है। इस संघर्ष में 200 से अधिक लोगों की जान चली गई।

मणिपुर भारत के पूर्वोत्तर में स्थित राज्य है। भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों को सेवन सिस्टर्स या सात बहनें भी कहा जाता है। मणिपुर की सीमा म्यांमार से लगती है। यहां अनुमानित 37 लाख लोग रहते हैं जिसमें आधे से अधिक मैतेई समुदाय के लोग निवास करते हैं, जबकि लगभग 43 फीसदी कुकी और नगा समुदाय के लोग निवास करते हैं, जो प्रमुख अल्पसंख्यक जनजातियां मानी जाती हैं। मणिपुर में इस साल मई में दो समुदाय बहुसंख्यक मैतेई और अल्पसंख्यक कुकी के बीच हिंसक झड़प देखने को मिली। इस हिंसा में अब तक करीब दो सौ लोग मारे गए हैं और हजारों लोग घायल हुए हैं। हिंसा को रोकने के लिए सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस के संघर्ष के कारण 60,000 से अधिक लोगों को अपने घरों से दूसरी जगहों पर जाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। बार-बार आपसी झड़पों के दौरान दोनों समुदायों ने कई जगहों पर तोड़फोड़ की और कई पुलिस थानों से हथियार भी लूट लिए। हिंसक झड़प के दौरान सैकड़ों चर्च और एक दर्जन से अधिक मंदिरों को भी तोड़ दिया गया और कई गांवों में आग लगा दी गई।

समस्या यह है कि मणिपुर में इतने दिनों से चल रही हिंसा में अब वहां का समाज, यहां तक कि प्रशासन भी दो हिस्सों में बंट चुका है। मैतेई इलाकों में कुकी सुरक्षाकर्मियों की तैनाती नहीं की जा सकती और न कुकी बहुल इलाकों में मैतेई सुरक्षाकर्मियों की। मणिपुर हिंसा को शुरू हुए नौ महीने बीत गए, मगर अभी तक कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि उस पर काबू पाने में सफलता मिली है। आए दिन वहां हिंसा भड़क उठती है और लोग मारे जाते हैं। अब भी पुलिस थानों, सुरक्षा बलों की चैकियों पर हमला कर भीड़ हथियार लूट ले जाती है और सुरक्षा बल उस पर काबू पाने में विफल नजर आते हैं।

जब कुकी महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार और उन्हें नंगा घुमाने का वीडियो सामने आया था, तब भी यह तथ्य उजागर हुआ था कि उन महिलाओं को सुरक्षाकर्मियों ने ही भीड़ के बीच ले जाकर छोड़ दिया था। सुरक्षाकर्मियों के भीतर से जब इस तरह किसी समूह की हिंसा को समर्थन मिलने लगे, तो वहां शांति प्रयासों को गति मिलना मुश्किल हो जाता है।
मणिपुर में लगातार अराजकता बढ़ रही है। सवाल यह है कि अदालत ने करीब एक साल से चल रहे जातीय संघर्ष में भारी जानमाल के नुकसान के बाद अब अपना फैसला पलटा है। यह कदम पहले ही उठाना चाहिए था। मणिपुर में हिंसा रोकने के लिए कोई मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई जाती, इस दिशा में किसी सकारात्मक नतीजे की उम्मीद
धुंधली ही बनी रहेगी। दोनों समुदाय के बीच प्रेम व सामाजिक विश्वास कायम करने के लिए घनीभूत प्रयास करना होगा। (हिफी)

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