मनरेगा और मुफ्त का राशन
अशोक त्रिपाठी।
सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का सदुपयोग हो रहा है अथवा दुरुपयोग यह देखना बहुत जरूरी होता है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ जनपद के माल ब्लाक में एक गांव के प्रधान ने अपने पूरे परिवार के सदस्यों के नाम पर मनरेगा का जाॅबकार्ड बनवा लिया। उनके नाम पर बिना काम किये मजदूरी का भुगतान लिया जा रहा था। इसी ब्लाक के एक गांव में होमगार्ड का मनरेगा जाबकार्ड बनवा दिया गया। यह रिपोर्ट जांच करने वाले लोकपाल आर आर बैसवार की है। लोकपाल पर हमला भी किया गया। ग्राम प्रधान संगठन जांच का विरोध कर रहा है। इसी प्रकार मुफ्त राशन वितरण में भी भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलीं। राशन कार्ड के सत्यापन में शिकायतें सही पायी गयी हैं। मनरेगा मजदूरी और मुफ्त राशन वितरण में भ्रष्टाचार सभी राज्यों में है। सरकार ने इसका जो उद्देश्य बनाया था वो कहीं पीछे छूट गया है। मनरेगा में ग्राम्यांचल में ही रोजगार मिलने के बावजूद शहरों में मजदूर मंडियों में भीड़ बढ़ती ही जा रही है। उधर, गांव में खेती के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। परेली जलाने जैसी समस्या भी इसी की देन है। खाद्यान्न उत्पादन भी कम हो रहा है। सरकार के कर्मचारी भी गांव के प्रधानों के सामने नतमस्तक हो गए हैं। ग्राम प्रधान भी नेताओं के वोटबैंक बन गये हैं। यही कारण है कि ईमानदार जांच अफसरों को काम नहीं करने दिया जाता है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुफ्त राशन वितरण प्रणाली को भ्रष्टाचार से मुक्त करने के लिए उसका डिजिटलीकरण कर दिया है। देश भर में इन दोनों योजनाओं के ईमानदारी से पर्यवेक्षण की जरूरत है।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) भारत में लागू एक रोजगार गारंटी योजना है, जिसे 2 अक्टूबर 2009 को संविधान द्वारा अधिनियमित किया गया था। यह योजना प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराती है जो प्रतिदिन 220 रुपये की सांविधिक न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य-सम्बंधित अकुशल मजदूरी करने के लिए तैयार हैं। ध्यान रहे कि 2010-11 वित्तीय वर्ष में इस योजना के लिए केंद्र सरकार का परिव्यय 40,100 करोड़ रुपए था। अब यह परिव्यय काफी बढ गया है। उत्तर प्रदेश सरकार ने 2024-25 वित्तीय वर्ष के लिए मनरेगा मजदूरी रेट में बदलाव किया है। राज्य में वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए मनरेगा मजदूरी दर 237 रुपये प्रति दिन तय की गई है। मनरेगा की यह नई रेट महंगाई को ध्यान में रखते हुए असंगठित श्रमिकों को उचित मेहनताना प्रदान करने के लिए तय की गई है। मनरेगा में आवेदन के बाद सरकार द्वारा अप्रूवल दिया जाता है। इसके बाद जाब कार्ड बन जाता है। कम से कम सौ दिन काम की गारंटी है। इसका मकसद, ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी कम करना है। इसी प्रकार केंद्र सरकार ने कोरोना काल से गरीबों को मुफ्त राशन व्यवस्था लागू की जो निरंतर बढ़ती गयी है। इन दोनों ही योजनाओं का सदुपयोग कम दुरुपयोग ज्यादा हुआ है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के जनपद में ही मनरेगा में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिली हैं । ये शिकायतें विपक्षी राजनीतिक पार्टियों ने नहीं दर्ज करायीं बल्कि मनरेगा में तैनात लोकपाल आर आर बैसवार ने अपनी शुरुआती जांच में पायी हैं। लोकपाल को राजधानी से सटे मोहनलालगंज व माल ब्लाक में मनरेगा में भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलीं। मोहनलालगंज के एक गांव के प्रधान ने मनरेगा में पंजीकृत मजदूरों से अपनी बिल्डिंग बनवाई। मजदूरों को भुगतान भी नहीं किया तो उन्होंने शिकायत की। लोकपाल की शुरुआती जांच में भ्रष्टाचार की शिकायत सही पायी गयी है। यही स्थिति अन्य प्रदेशों की भी है। गरीबों को मुफ्त राशन भी कितने ही अपात्र डकार रहे हैं। राशनकार्ड के सत्यापन में इसका खुलासा हुआ।
मनरेगा के कामों में भ्रष्टाचार खूब हो रहा है। ग्राम प्रधान पूरे परिवार का जॉब कार्ड बना कर मजदूरी अपनी जेब में रख ले रहे हैं। ग्राम प्रधान व रोजगार सेवक ब्लॉक के अधिकारियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। लोगों के जॉब कार्ड बनाकर मजदूरी हड़प रहे हैं जो या तो काम पर नहीं जाते हैं या कहीं दूसरी जगह नौकरी कर रहे हैं। माल ब्लॉक के एक गांव के प्रधान ने अपने पूरे परिवार का जॉब कार्ड बना दिया है। सबकी मजदूरी उसकी जेब में जा रही है। उनके कई चहेते जो दूसरे शहरों में रहते हैं, उनके नाम भी जॉब कार्ड बनाए हैं। उनकी मजदूरी का भी 50 फीसदी हिस्सा प्रधान व रोजगार सेवक की जेब में आ रहा है। यह बात मनरेगा में तैनात लोकपाल आरआर वैसवार अपनी शुरुआती जांच रिपोर्ट के आधार पर बता रहे हैं। लोकपाल को मोहनलालगंज व माल ब्लॉक में मनरेगा में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार की शिकायतें मिली हैं। मोहनलालगंज के एक गांव के प्रधान ने मनरेगा में पंजीकृत मजदूरों से अपनी बिल्डिंग बनवाई। फिर उन्हें मजदूरी भी नहीं दी। मजदूरों ने शिकायत की तो लोकपाल की शुरुआती जांच में भ्रष्टाचार की पुष्टि हुई पर ब्लॉक के अधिकारियों ने दस्तावेज नहीं दिए। निगोहां में भ्रष्टाचार की शिकायत पर रिपोर्ट मांगी तो ब्लॉक के अफसरों ने इसे भी दबा दिया है। माल ब्लॉक के बहिर गांव में बड़ी संख्या में दूसरे शहरों में काम करने वाले लोगों के फर्जी जॉब कार्ड बने हैं। यहां की शिकायत की जांच करने 21 अक्तूबर को खुद लोकपाल टीम के साथ मौके पर पहुंचे तो केवल पांच मजदूर काम कर रहे थे लेकिन 40 को काम करते दिखाया गया था। शिकायतकर्ता का बयान लेने का प्रयास किया तो लोकपाल पर हमला हो गया। उनके सामने ही दबंगों ने शिकायतकर्ता को बुरी तरीके से पीटा।
गरीबों को भूखे पेट न सोने देने की गारंटी लेने वाली राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना भी भ्रष्टाचार के घेरे में है। गरीबों के हक के राशन में लूट मची है। अंत्योदय व पात्र गृहस्थी योजना के लाभार्थी व्यवस्था के हाथों छले जा रहे हैं। पूर्ति निरीक्षक प्रति यूनिट की दर से कोटेदारों से रुपये वसूलते हैं। कोटेदार इसकी भरपाई राशन में घटतौली कर करते हैं। प्रति यूनिट पांच किलो मिलने वाला राशन गरीबों को चार किलो तक भी नहीं मिल पा रहा है। वैश्विक महामारी कोविड-19 से बचाव के लिए किए गए लाकडाउन में गरीब परिवारों का पेट भरने के लिए निःशुल्क राशन वितरण चर्चा में रहा। पहले न्यूनतम मूल्य पर प्रतिमाह गरीब परिवारों को राशन दिया जाता था।
सार्वजनिक राशन वितरण प्रणाली को पारदर्शी और पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए योगी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। पूरी प्रक्रिया का डिजिटलीकरण करने के साथ सरकार ने योजनाओं के क्रियान्वयन पर निगरानी बढ़ा दी है।योगी सरकार ने प्रदेश भर में ऑनलाइन राशन कार्ड मैनेजमेंट सिस्टम लागू किया है। प्रदेश भर में अंत्योदय योजना के कुल 4076302 और चयनित पात्र गृहस्थी के 31757376 कार्डधारकों का डाटा डिजिटल प्लेटफार्म पर लाया जा चुका है। आधार प्रमाणीकरण और ओटीपी प्रमाणीकरण के जरिये राशन वितरण व्यवस्था को पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त किया गया है। देश में अन्य राज्यों में भी इसी प्रकार की व्यवस्था करनी चाहिए।

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