परम्परागत कृषि विकास योजना
परम्परागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2015 में शुरू की गयी एक प्रमुख योजना है जो राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के अंतर्गत आती है। इसका उद्देश्य किसानों को पारंपरिक और प्राकृतिक खेती की ओर प्रोत्साहित करना है ताकि रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को कम किया जा सके और उत्पादन को सुरक्षित एवं पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सके। योजना के तहत 2025 तक भारत में 20 लाख हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती के अंतर्गत लाने का लक्ष्य रखा गया है। यह योजना भारतीय कृषि को सुरक्षित, समृद्ध और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की दिशा में कार्य कर रही है। यह किसानों को आर्थिक लाभ के साथ-साथ भूमि की उर्वरता को सुरक्षित रखने में मदद करती है। इसके द्वारा किसान न केवल अधिक आय अर्जित कर सकते हैं बल्कि स्वस्थ और रसायन मुक्त उत्पादन भी कर सकते हैं।
योजना के मुख्य बिन्दु
- यह योजना वर्ष 2015-16 में की गई थी।
- यह योजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के अंतर्गत आती है और इसका उद्देश्य जैविक खेती को प्रोत्साहित करना है।
- इसके तहत 2025 तक भारत में 20 लाख हेक्टेयर भूमि को जैविक खेती के अंतर्गत लाने का लक्ष्य रखा गया है।
- इस योजना से किसानों की आय में वृद्धि करना और कृषि को पर्यावरण के अनुकूल बनाना है।
- इस योजना से भारतीय जैविक उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान दिलाना है।
योजना के उद्देश्य
- रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना: पारंपरिक खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से भूमि की उर्वरता घट रही थी और पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा था। जैविक खेती को बढ़ावा देकर इस समस्या को हल करने का प्रयास किया गया।
- स्वस्थ और सुरक्षित फसल उत्पादन: जैविक खेती के माध्यम से उगाई गई फसलें रासायनिक अवशेषों से मुक्त होती हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित होती हैं।
- मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार: पारंपरिक कृषि तकनीकों में जैविक खाद और प्राकृतिक तरीकों का उपयोग किया जाता है, जिससे मिट्टी की संरचना और जैव विविधता बनी रहती है।
- पर्यावरण संरक्षण: जैविक खेती से जल, मृदा और वायु प्रदूषण कम होता है, जिससे पर्यावरण की रक्षा होती है।
- मिट्टी का संरक्षण: रासायनिक उर्वरकों से होने वाले नुकसान को कम करके प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
- कम लागत वाली खेती: रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर खर्च कम होने से किसानों की लागत भी घटती है और उनकी आय में वृद्धि होती है।
- ग्रामीण रोजगार: प्राकृतिक खेती के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन।
- निर्यात को प्रोत्साहन: जैविक उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक मांग है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है।
योजना का कार्यान्वयन
- यह योजना राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) के तहत लागू की जाती है।
- किसानों के समूह बनाकर (20 हेक्टेयर या उससे अधिक) उन्हें जैविक खेती के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।
- तीन वर्षों तक किसानों को वित्तीय सहायता दी जाती है, जिसमें बीज, उर्वरक, और कृषि उपकरण शामिल हैं।
- कृषि उत्पादन को प्रमाणित जैविक बनाने के लिए प्रमाणन प्रक्रिया अपनाई जाती है।
वित्तीय प्रावधान
- प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष रुपये 20,000 तक की सहायता प्रदान की जाती है।
- यह सहायता तीन वर्षों तक मिलती है, जिसमें जैविक बीज, खाद, और प्रमाणन की लागत शामिल है।
योजना का लाभ
मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार:
0 जैविक खेती के अंतर्गत रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थान पर जैविक खाद (कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट, हरी खाद) का उपयोग किया जाता है।
0 इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और जैव विविधता बनी रहती है।
स्वस्थ और पोषक फसल उत्पादन:
0 जैविक तरीकों से उगाई गई फसलें स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती हैं क्योंकि इनमें रसायनों का उपयोग नहीं होता।
0 उत्पाद की गुणवत्ता अधिक होती है जिससे बाजार में अच्छी कीमत मिलती है।
उच्च मूल्य प्राप्ति:
0 जैविक उत्पादों की मांग बढ़ने के कारण किसानों को इनके लिए बाजार में सामान्य फसलों की तुलना में अधिक मूल्य प्राप्त होता है।
0 देश के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी जैविक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
निर्यात के अवसर:
0 पारंपरिक खेती द्वारा उत्पादित जैविक फसलों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में निर्यात किया जा सकता है।
0 भारत सरकार द्वारा जैविक उत्पादों के निर्यात को प्रोत्साहित किया जाता है।
प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण:
0 परंपरागत खेती में जल, भूमि और वायु की गुणवत्ता को सुरक्षित रखा जाता है।
0 जल संरक्षण, भूमि संरक्षण और प्रदूषण कम करने में यह योजना सहायक है।
किसानों को प्रशिक्षण और सहायता:
0 किसानों को जैविक खेती के तरीकों के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाते हैं।
0 बीज, खाद, जैविक कीटनाशक आदि की उपलब्धता के लिए भी सहायता दी जाती है।
समूह आधारित खेती:
0 किसानों को क्लस्टर फार्मिंग के तहत एक साथ जोड़कर सामूहिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
0 इससे उत्पादन लागत कम होती है और फसल प्रबंधन आसान हो जाता है।
प्रमाणन एवं ब्रांडिंग की सुविधा:
0 इस योजना के तहत जैविक उत्पादों के प्रमाणीकरण की सुविधा उपलब्ध है।
0 प्रमाणीकरण से उत्पादों की विश्वसनीयता बढ़ती है और बिक्री में सुधार होता है।
कृषि लागत में कमी:
0 रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग में कमी आने से उत्पादन की लागत घटती है।
0 देसी बीज और गोबर खाद जैसे सस्ते विकल्पों का उपयोग होता है।
पर्यावरण संरक्षण में योगदान:
0 रासायनिक पदार्थों का कम उपयोग होने से पर्यावरण सुरक्षित रहता है।
0 जैविक खेती कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में सहायक होती है।
चुनौतियाँ
- प्रमाणीकरण की जटिलता: जैविक उत्पादों के प्रमाणन की प्रक्रिया कठिन और समय लेने वाली है।
- प्राकृतिक उर्वरकों की कमी: गोबर, जैविक खाद आदि की उपलब्धता कम है।
- तकनीकी जानकारी का अभाव: किसानों को जैविक खेती के नए तरीकों की पूरी जानकारी नहीं होती।
- बाजार तक पहुंच की कमी: ग्रामीण क्षेत्रों में जैविक उत्पादों के लिए बाजार तक पहुंच सीमित है।
संभावनाएँ
- वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा: भारतीय जैविक उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बड़ा अवसर प्राप्त हो सकता है।
- स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता: लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ने से जैविक उत्पादों की मांग बढ़ रही है।
- पर्यावरण संरक्षण: रासायनिक मुक्त खेती से पर्यावरण का संतुलन बेहतर होता है।

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